भारतकोश
अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)

अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)

Aparajitapriccha of Bhuvanadeva with Commentary by Shrikrishna Jugnu

भुवनदेवाचार्य (टीकाकार: डॉ. श्रीकृष्ण 'जुगनू') द्वारा

DevanagariHindipublished535 पृष्ठ

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सूत्र- १८ 79 और गति बताते हुए उनके किसी भी प्रकार की ध्वनि किए बिना अपने आप स्व प्रमाणतः दक्षिणावर्त भ्रमण करने के बारे में भी कहिए। हे प्रभो! तिथियों की संख्या, प्रमाण, पक्ष, मास, ऋतुकाल, वर्ष आदि के बारे में भी संक्षेप से बताइए। विश्वकर्मोवाच – बिम्बमानं ततस्तात शृणुचैकाग्रमानसः। अनुक्रमेण कथये सूर्यादीनामथोऽधुना॥ ४॥ सूर्यादीनां ग्रहाणां तु कथ्यन्ते बिम्बकानि तु। वृत्तव्यासौ बिम्बमाने कथयामि समासतः॥ ५॥ विश्वकर्मा कहने लगे – हे तात! मैं सूर्यादि से लेकर अभी तक के बिम्बमानों के बारे में अनुक्रम से कहता हूँ जिसे तुम एकाग्र मन से सुनो। सूर्यादि ग्रहों के बिम्बों के वृत्त और व्यास तथा उनके बिम्बमानों को संक्षेप से कहता हूँ। सूर्यादिग्रहाणां बिम्बप्रमाणमाह – षट्सहस्रपञ्चशतयोजनैः स्याच्च विस्तरः। सूर्यबिम्बप्रमाणं तु विद्युत्कोटिसमप्रभम्॥ ६॥ सूर्य के बिम्बमान का विस्तार छह हजार पाँच सौ योजन का है और उसकी प्रभा अर्थात तेज चमक करोड़ों विद्युत तड़ितों के समान है। चतुर्भिंश्च सहस्राणां द्व्यष्टाशीत्या च योजनैः। सोमबिम्बप्रमाणं तत् सुधातेजः समुद्भवम्॥ ७॥ चन्द्रमा का बिम्बमान चार हजार अठासी योजनों का है, उससे अमृत रूपी तेज निकलता रहा है। भौमस्य बिम्बमानं तु पृथु योजनविंशतिः। बुधस्य बिम्बमानं च विस्तृतं शतयोजनैः॥ ८॥ मङ्गल के बिम्बमान का प्रमाण बीस योजन के विस्तार का है और बुध के बिम्बमान का प्रमाण एक सौ योजन के विस्तार में है। द्वाचत्वारिंशश्च सार्ध गुरुबिम्बं प्रमाणतः। पञ्चसप्ततिः शुक्रस्य शतार्धं पञ्च वै शनैः॥ ९॥ साढ़े बयालीस योजन गुरु का बिम्बमान है और पिचहत्तर योजन शुक्र का बिम्बमान है। इसी प्रकार पचपन योजन का बिम्बमान शनि ग्रह का कहा गया है। अष्टसहस्रयोजनप्रमाणं राहुमण्डलम्।