भारतकोश
अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)

अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)

Aparajitapriccha of Bhuvanadeva with Commentary by Shrikrishna Jugnu

भुवनदेवाचार्य (टीकाकार: डॉ. श्रीकृष्ण 'जुगनू') द्वारा

DevanagariHindipublished535 पृष्ठ

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मेरुलिङ्गं समाख्यातं पृथ्वी च जलधारिका। वितानं व्योमचाख्यातं लम्बतीत्थमुमापतिः ॥ २८ ॥ भूमण्डल में मेरु पर्वत शिवलिङ्ग के समान आख्यात है और यह पृथ्वी उस शिवलिङ्ग की जलधारिक स्वरूप है, यह व्योमाकाश विशाल वितान के रूप में आख्यात है जिसमें उमापति महेश्वर लाम्बायमान रूप में मेरु स्वरूप स्थित है। ध्रुवमण्डलमुत्पन्नं ब्रह्माण्डाकाररूपकम्। तारामण्डलमित्युक्तं कथ्यते तच्च सङ्ख्यया ॥ २९ ॥ सप्तदशार्बुदमेव लक्षाणां षष्टिरेव च। षष्टिश्च तारकायुक्तं खङ्ख्यातं ध्रुवमण्डलम् ॥ ३० ॥ अरुन्धती विष्णुपदी सप्तर्षयस्तथोत्तमाः। ध्रुवाद्यं तारकालिङ्गमेतेषां बाह्यतो ध्रुवम् ॥ ३१ ॥ ध्रुव मण्डल में ब्रह्माण्डाकार रूप में जो तारा मण्डल कहा गया है, उसकी संख्या सत्रह अरब, साठ लाख और साठ तारों के साथ संख्या वाला यह ध्रुव मण्डल है। अरुन्धन्ती, विष्णुपदी, सप्तऋषि उत्तम और ध्रुव से आरम्भ होने वाले समस्त तारक लिङ्ग है जो ध्रुव के बाहर की ओर है अर्थात् ध्रुव केन्द्र में है। इति सूत्रसन्तानगुणकीर्तिप्रकाशप्रोक्त श्रीभुवनदेवाचार्योक्तापराजितपृच्छायां ग्रहादिध्रुवमण्डलाधिकारो नाम सप्तदश सूत्रम् ॥ १७ ॥ इस प्रकार भुवनदेवाचार्य कृत सूत्रसन्तानगुणकीर्ति प्रकाश या अपराजितपृच्छा में ग्रहादि ध्रुवमण्डल अधिकार नामक सत्रहवाँ सूत्र पूर्ण हुआ ॥ १७ ॥ ग्रहगतिमानमुहूर्तादिप्रमाणमष्टादश सूत्रम् ॥ १८॥ अपराजित उवाच - कथितानि मण्डलानि ध्रुवादेर्ग्रहसङ्ख्यया। अतस्तेषां पुनस्त्वेवं बिम्बमानं निबोधय ॥ १ ॥ बिम्बमानगतिश्चैव ग्रहाद्याः क्रमयोगतः। भ्रमन्ति दक्षिणावर्ते ह्यध्वनि स्वप्रमाणतः ॥ २ ॥ तिथिसङ्ख्याप्रमाणं च पक्षमासौ तथैव च। ऋतुकालं वत्सरांश्च कथयस्व समासतः ॥ ३ ॥ अपराजित बोले - ध्रुवादि ग्रह मण्डलों की संख्या आपने कही, अब पुनः कृपा करके उनके बिम्बमानों के बारे में भी कुछ बताएँ। ग्रहों के क्रमवार बिम्बमान