अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)
Aparajitapriccha of Bhuvanadeva with Commentary by Shrikrishna Jugnu
भुवनदेवाचार्य (टीकाकार: डॉ. श्रीकृष्ण 'जुगनू') द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसूत्र- २७ ११ ध्रुवचक्रसमुत्थाध्वा चक्षुर्ज्ञानेन व्योम्नि च ॥ २१ ॥ समलक्षार्धमादित्यं सहस्राणां द्विसप्ततिः। भूमिक्षारार्णवोर्ध्वं च योजनान्यर्कमण्डलम् ॥ २२ ॥ ब्रह्माण्ड के इस व्योमाकाश में चौदह लाख योजनों की संख्या तक असंख्य ध्रुवचक्र (निहारिकाएँ) फैले हुए हैं जो खुली आँखों से दिखाई देते हैं (अर्थात् दृग्गणित ज्योतिष के विषय हैं, दूरवीक्षण यन्त्रों की सहायतासे दिखाई सकने वाले ध्रुवचक्रों की तो बात नई नहीं है)। इन दिखाई देने वाले ध्रुवमण्डलों में साढ़े सात लाख तो आदित्य हैं, जो इस लवणीय समुद्र के ऊपर चौदह हजार योजनों की ऊँचाई पर स्थित अर्कमण्डलों अर्थात् सूर्यलोकों में फैले हुए हैं। तत्परं चन्द्रमण्डलं पञ्चाशतसहस्रैः स्थितम्। अष्टाशीतिसहस्राणि भौमोर्ध्वं भौमसंस्थितिः ॥ २३ ॥ इनके परे चन्द्र मण्डल अर्थात् चन्द्रलोक है जो पचास हजार योजनों की दूरी पर स्थित है। इसी तरह चन्द्र मण्डल के ऊपर अठासी हजार योजन दूरी पर मङ्गल मण्डल की स्थिति है। लक्षं त्रिषष्टिसहस्राणि भौमोर्ध्वं बुधमण्डलम्। चतुर्विंशसहस्राणि बुधोर्ध्वं च बृहस्पतिः ॥ २४ ॥ एक लाख तिरसठ हजार योजनों की दूरी पर स्थित, भौममण्डल से ऊपर बुध मण्डल है और बुध मण्डल से चौबीस हजार योजन ऊपर बृहस्पति मण्डल है। सूर्योर्ध्वं चैव लक्षार्द्धं शुक्रस्य मण्डलं विदुः। शुक्रलोकात्तथा चोर्ध्वं षट्षष्टिभिः सहस्रकैः ॥ २५ ॥ सूर्यतश्च परे ख्यातः सूर्यपुत्रशनैश्वरः। सूर्य के ऊपर आधे लाख योजन की दूरी पर शुक्र का मण्डल विद्यमान है। शुक्रलोक से ऊपर, छासठ हजार योजन दूरी पर सूर्य से परे सूर्यपुत्र शनैश्वर का मण्डल विख्यात है। सूर्याधः षष्टिसहस्रै राहुमण्डलमास्थितम् ॥ २६ ॥ रवेः समन्तात् केतुश्च रथपृष्ठेऽनुगच्छति। शतकोटियोर्जनानां ब्रह्माण्डम्य प्रमाणकम् ॥ २७ ॥ इसी प्रकार सूर्य से नीचे, साठ हजार योजन पर राहुमण्डल स्थित है और रवि या सूर्य के अन्त में साथ-साथ सूर्यरथ के पीछे-पीछे केतु जाता है। इस प्रकार इस ब्रह्माण्ड का विस्तार प्रमाण सौ करोड़ योजनों का है।