भारतकोश
अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)

अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)

Aparajitapriccha of Bhuvanadeva with Commentary by Shrikrishna Jugnu

भुवनदेवाचार्य (टीकाकार: डॉ. श्रीकृष्ण 'जुगनू') द्वारा

DevanagariHindipublished535 पृष्ठ

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अथ पञ्चाङ्गलक्षणानि — नक्षत्रयोगा राशिश्च तिथयः करणादिकम् ॥ 14 ॥ तारकालिङ्गमित्युक्तं मातृमण्डलसम्भवम्। वैष्णवे च पदे चैव भ्राम्यतीत्थं ध्रुवावृतम् ॥ 15 ॥ नक्षत्र, योग, राशि, तिथियाँ और पाँचवाँ करण— ये सभी पञ्चाङ्ग कहे जाते हैं। इन सबको तारक नाम से कहा गया है और ये सभी मातृमण्डल से उत्पन्न हुए हैं। ये समस्त तारक विष्णु के पद से ध्रुववृत्त के चारों ओर भ्रमणरत हैं। ग्रहनामादीनां — दिवाकरः शशाङ्कश्च भौमश्च बुध एव च। त्रिदशाचार्यशुक्रौ च शनिश्च राहुकेतुकौ ॥ 16 ॥ सूर्याद्यं च समं त्वेवं ध्रुवग्रहादिकं तथा। भ्राम्यति दक्षिणावर्तमचाल्यं ध्रुवसत्पदम् ॥ 17 ॥ सूर्य, चन्द्र, मङ्गल, बुध, गुरु, शुक्र, शनि, राहू और केतु ये ग्रह कहलाते हैं। सूर्य से लेकर सभी ग्रह समान रूप से अचल ध्रुव के चारों ओर प्रदक्षिणा क्रम से भ्रमण करते हैं। प्रदक्षिणं तथर्क्षाणां सम्पूर्णा सप्तविंशतिः₂₇। ऋक्षमध्ये यथा राशौ ग्रहास्तिथ्यादयस्तथा ॥ 18 ॥ चारः क्रामति योगेन मेरुमावृत्य दक्षिणम्। प्रदक्षिणा करने वाले सम्पूर्ण नक्षत्रों की संख्या 27 है। इन्हीं नक्षत्रों के बीच में ग्रह राशियाँ, तिथियाँ आदि होती हैं। ये सब मेरु पर्वत को दक्षिणावर्त करके विविध योगों में भ्रमण या चार करते हैं। तत्रैव मण्डलपृथुत्वञ्च बिम्बमानमाह — मण्डलानि पृथुत्वं च बिम्बमानं च कथ्यते ॥ 19 ॥ क्षारार्णवोदकं भूमौ कथ्यते ग्रहमण्डलम्। योजनैर्व्योमसङ्ख्यातं कथयामि समासतः ॥ 20 ॥ अब मैं इनके मण्डल, प्रसार और बिम्बमान आदि के विषय में कहूँगा। भूमि पर लवणीय समुद्र के बारे में, ग्रहमण्डल के बारे में और असंख्य योजन की दूरी तक व्यास इस व्योम आकाश के बारे में भी संक्षेप से कहूँगा। चतुर्दशलक्षाणां च योजनानां तु सङ्ख्यया।