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अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)

Aparajitapriccha of Bhuvanadeva with Commentary by Shrikrishna Jugnu

भुवनदेवाचार्य (टीकाकार: डॉ. श्रीकृष्ण 'जुगनू') द्वारा

DevanagariHindipublished535 पृष्ठ

सूत्र- १८ 79 और गति बताते हुए उनके किसी भी प्रकार की ध्वनि किए बिना अपने आप स्व प्रमाणतः दक्षिणावर्त भ्रमण करने के बारे में भी कहिए। हे प्रभो! तिथियों की संख्या, प्रमाण, पक्ष, मास, ऋतुकाल, वर्ष आदि के बारे में भी संक्षेप से बताइए। विश्वकर्मोवाच – बिम्बमानं ततस्तात शृणुचैकाग्रमानसः। अनुक्रमेण कथये सूर्यादीनामथोऽधुना॥ ४॥ सूर्यादीनां ग्रहाणां तु कथ्यन्ते बिम्बकानि तु। वृत्तव्यासौ बिम्बमाने कथयामि समासतः॥ ५॥ विश्वकर्मा कहने लगे – हे तात! मैं सूर्यादि से लेकर अभी तक के बिम्बमानों के बारे में अनुक्रम से कहता हूँ जिसे तुम एकाग्र मन से सुनो। सूर्यादि ग्रहों के बिम्बों के वृत्त और व्यास तथा उनके बिम्बमानों को संक्षेप से कहता हूँ। सूर्यादिग्रहाणां बिम्बप्रमाणमाह – षट्सहस्रपञ्चशतयोजनैः स्याच्च विस्तरः। सूर्यबिम्बप्रमाणं तु विद्युत्कोटिसमप्रभम्॥ ६॥ सूर्य के बिम्बमान का विस्तार छह हजार पाँच सौ योजन का है और उसकी प्रभा अर्थात तेज चमक करोड़ों विद्युत तड़ितों के समान है। चतुर्भिंश्च सहस्राणां द्व्यष्टाशीत्या च योजनैः। सोमबिम्बप्रमाणं तत् सुधातेजः समुद्भवम्॥ ७॥ चन्द्रमा का बिम्बमान चार हजार अठासी योजनों का है, उससे अमृत रूपी तेज निकलता रहा है। भौमस्य बिम्बमानं तु पृथु योजनविंशतिः। बुधस्य बिम्बमानं च विस्तृतं शतयोजनैः॥ ८॥ मङ्गल के बिम्बमान का प्रमाण बीस योजन के विस्तार का है और बुध के बिम्बमान का प्रमाण एक सौ योजन के विस्तार में है। द्वाचत्वारिंशश्च सार्ध गुरुबिम्बं प्रमाणतः। पञ्चसप्ततिः शुक्रस्य शतार्धं पञ्च वै शनैः॥ ९॥ साढ़े बयालीस योजन गुरु का बिम्बमान है और पिचहत्तर योजन शुक्र का बिम्बमान है। इसी प्रकार पचपन योजन का बिम्बमान शनि ग्रह का कहा गया है। अष्टसहस्रयोजनप्रमाणं राहुमण्डलम्।

80 अपराजितपृच्छा केतोश्च भौमतुल्यं स्यात् कथितं च प्रमाणतः ॥ 10 ॥ इसके अतिरिक्त राहु मण्डल का प्रमाण आठ हजार योजन का है तथा केतु का बिम्बमान मङ्गल के तुल्य अर्थात् बीस योजन का है। यह मैंने प्रमाणतः कहा है। ध्रुवस्य प्रदक्षिणागतिक्रमाह — गतिक्रमं च वक्ष्याति ध्रुवमेकं प्रदक्षिणम्। योजनैश्च गतिस्त्वेवं गम्यते च प्रदक्षिणम् ॥ 11 ॥ अब मैं ध्रुव की एक प्रदक्षिणा के गतिक्रम तथा प्रदक्षिणा में जाते समय की उनकी योजनों में होने वाली गति के बारे में कहता हूँ। निमिषे द्विशतं भानुः ग्लौः सार्धद्विसहस्रकम्। त्रयस्त्रिंशदधिकशतयोजनैर्भौमगतिः ॥ 12 ॥ बुधश्च सूर्यमानेन भ्रमति ध्रुवदक्षिणम्। गुरुश्च क्रमते चैव योजनैर्दशपञ्चभिः ॥ 13 ॥ शुक्रसूर्यगतिश्चैव द्विशतं निमिषान्तरे। समयोजनत्रिभागं निमिषात्तु शनैश्चरः ॥ 14 ॥ योजनरकादशभी राहोश्च निमिषे गातः। केतुर्भानोः समन्ताच्च भ्रमते दक्षिणावृतम् ॥ 15 ॥ निमिष में सूर्य की गति दो सौ योजन और ग्लौ (चन्द्रमा) की एक निमिष में ढाई हजार योजन गति होती है। एक निमिष में ही मङ्गल की गति एक सौ तैतीस योजन की होती है। बुध की गति सूर्य के मान के बराबर एक निमिष में दो सौ योजन होती है जो ध्रुव के दक्षिण में भ्रमण करता है। गुरु की भ्रमण गति भी एक निमिष में पन्द्रह योजन की होती है। शुक्र की भी सूर्य की गति के समान ही एक निमिष में दो सौ योजन की होती है तथा शनि की गति एक निमिष में पौने आठ योजन की होती है। इसी प्रकार राहु की गति एक निमिष में ग्यारह योजन और केतु का गतिमान भी राहु के समान ही ग्यारह योजन प्रति निमिष होता है जो दक्षिणावृत्त में भ्रमण करता है। आमध्याह्नमुदयतो ह्यष्टधा च दिनार्धकम्। चत्वारिंशत्त्वेकहीनं सहस्राण्याद्यसङ्क्रमे ॥ 16 ॥ सूर्योदय से मध्याह्न तक अष्टधा अर्थात् दिनार्द्ध होता है। इस अवधि से चालीस से एक कम अर्थात् उनतालीस हजार संक्रमण सूर्योदय से मध्याह्न तक होते हैं।

सूत्र-१८ 81 तदूर्ध्वं च षड्‌विंशत्या त्वेकत्रिंशत् सदा क्रमः। चतुर्विंशतिरूपर्ध्वे तु दशपञ्च तथोत्तरे ॥ 17 ॥ इससे ऊपर छब्बीस से लेकर इकतीस तक के सदाक्रम में, चौबीस से ऊपर पन्द्रह, इस प्रकार कुल उनतालीस उत्तर में भी होते हैं। अग्रे गतिश्च दशभिः पञ्चभिर्मध्यमाश्रिते। त्रिभिः सहस्रैर्मध्याह्ने योजनैर्गतिमादिशेत् ॥ 18 ॥ इसके आगे की गति दस और पाँच के मध्य आश्रित रहती है। तीन हजार योजन की गति मध्याह्न तक (आदिशेत्) कही गई है। पूर्वाह्ने च गतिं ज्ञात्वा विपरीता परेऽहनि। एवं क्रमैः युक्तियोगो ग्रहाणां च गतिस्तथा ॥ 19 ॥ पूर्वाह्न की गति जानने पर उससे विपरीत करके अपराह्न की गति लानी चाहिए। इस क्रम से युक्तियोग और ग्रहों की गति लाई जाती है। भुक्तिमानं गतिश्चैवं सूर्यादिग्रहमण्डले। प्रयुक्तश्च ध्रुवो मध्ये भ्रमते दक्षिणावृतम् ॥ 20 ॥ सूर्यादि ग्रह मण्डल में जितनी गति भुक्तिमान हुई है, उसे प्रयुक्त करके वे ध्रुव के मध्य में दक्षिणावृत्त में भ्रमण करते हैं। प्रदक्षिणीकृते तस्मिनहोरात्रमितिस्मृतम्। प्रदक्षिणार्द्धमावृत्ते दृष्टे सूर्ये तथा दिवि ॥ 21 ॥ तथा रात्रिरथाख्याता सूर्ये चादृष्टतां गते। तस्यैव षष्टिकांशस्तु₆₀ प्रोच्यते घटिकाभिधा ॥ 22 ॥ इस प्रकार के प्रदक्षिणा करने से इससे अहोरात्र अर्थात दिन-रात की संज्ञा से स्मरण किया जाता है। प्रदक्षिणा की अर्ध आवृत्ति में जब तक सूर्य दिखाई देता है, तब तक दिन कहा जाता है तथा सूर्य के अदृष्ट हो जाने पर (प्रदक्षिणा की दूसरी अर्ध आवृत्ति को) रात्रि कहा जाता है। इसी दिन और रात का साठवाँ अंश घटिका के नाम से जाना जाता है। ताभिर्दिनं षष्टिभिश्च मासस्त्रिंशद्दिनैर्भवेत्। घटिकाषष्टिपलैर्निमेषः पञ्चदशपलैः ॥ 23 ॥ ऐसी साठ-साठ घटियों के योग से बनने वाले तीस दिनों का मास बनता है और घटिका साठ पल की तथा निमेष पन्द्रह पल का होता है।

82 अपराजितपृच्छा निमेषषोडशांशस्तु कला कलार्धं लम्बकः । लम्बकार्धे लम्बकाक्ष्यो लम्बकार्धे पादैस्त्रिभिः ? ॥ २४ ॥ निमेष के सोलहवें अंश को कला कहते हैं और आधी कला को लम्बक तथा लम्बक का आधा लम्ब और लम्ब का आधा पाद होता है। तीन पाद से ? उभौ करगृहीत अलम्बं त्रुटिशब्दतः ? । द्वे घट्यौ च मुहूर्तं स्यात् लग्नं पञ्चघटीभवम् ॥ २५ ॥ दोनों हाथों से अलम्ब त्रुटि शब्द से जाना जाता है ? दो घटी का मुहूर्त होता है और पाँच घटी का लग्न होता है।¹ सूर्यादि सप्तवाराश्च क्रमेण तिथयस्तथा । एवं प्रोक्तं मुहूर्तादि ह्यहोरात्रादिमध्यतः ॥ २६ ॥ क्रमयुक्तिर्विधातव्या कालसङ्ख्यामतः परम् । सूर्यादि से शुरू करते हुए सात (रविवार, सोम, मङ्गल, बुध, गुरु, शुक्र एवं शनि) वार होते हैं और एक के क्रम से (पन्द्रह तक) तिथियाँ होती हैं। इस प्रकार से दिन और रात के मध्य मुहूर्त आदि कहे गए हैं। ऐसा क्रम युक्ति से बनाना चाहिए। इसके परे काल संख्या को कहा जाएगा। इति सूत्रसन्तानगुणकीर्तिप्रकाशप्रोक्तश्रीभुवनदेवाचार्योक्ता०-जितपृच्छां ग्रहगतिमान मुहूर्तादिप्रमाणनिर्णयाधिकारेऽष्टादश सूत्रम् ॥ १८ ॥ इस प्रकार भुवनदेवाचार्य कृत सूत्रसन्तानगुणकीर्ति प्रकाश या अपराजितपृच्छा में ग्रहगतिमान मुहूर्तादि प्रमाण निर्णय अधिकार नामक अठारहवाँ सूत्र पूर्ण हुआ ॥ १८ ॥ तिथिमासर्तुकालसंवत्सरो नामैकोनविंशं सूत्रम् ॥ १९॥ अपराजित उवाच - कालसङ्ख्या कथं देव ह्यष्टयामादिकं तथा । तिथिसंवत्सराद्यं च कथयस्व प्रसादतः ॥ १ ॥ संवत्सराभिधानानि पृथक् चैवं प्रमाणतः ।

  1. विष्णुपुराण में 15 निमेष की 1 काष्ठा तथा 30 काष्ठा की 1 कला और 30 कला का 1 मुहूर्त कहा गया है, 30 मुहूर्त का 1 दिन एवं रात्रि बताई गई है और 30 अहोरात्र का एक मास कहा है- काष्ठापञ्चदशाख्याता निमेषा मुनिसत्तम। काष्ठा त्रिंशत्कला तास्ता त्रिंशन्मौहूर्तिको विधिः ॥ तावत्संख्यैरहोरात्रं मुहूर्तैर्मानुषं स्मृतम्। अहोरात्राणि तावन्ति मासः पक्षद्वयात्मकः ॥ तैः षड्भिरयनं वर्षं द्वेऽयने दक्षिणोत्तरे। अयनं दक्षिणं रात्रिर्देवानामुत्तरं दिनम्॥ (अंश 1, 3, 8-10)

सूत्र-१९ 83 कथयस्व प्रसादेन विश्वेश जगतांपते ॥ २ ॥ अपराजित बोले — हे देव ! अष्टयामादिक काल संख्या कितनी है, आप कृपा करके तिथि, संवत्सरादि उन सबको कहें। सभी संवत्सरों के नामों को प्रमाणपूर्वक पृथक्-पृथक् समझाएँ। हे जगत्पते ! विश्वेश !! इस बारे में आपका कृपा-प्रसाद चाहिए। विश्वकर्मोवाच — अहोरात्रादितः सङ्ख्या दृष्टे सूर्योदये मता । अष्टौ यामाश्च सम्प्रोक्ता अहोरात्रसमुद्भवाः ॥ ३ ॥ जयो विजय आख्यातो महाशङ्कश्च शङ्कुकः । उदयाद्धि समाख्याताश्चत्वारश्च निशापतेः ॥ ४ ॥ विश्वकर्मा ने कहा — दिन-रातों की संख्या सूर्य के उदय होने के साथ देखकर मानी गई है। इन दिन-रातों में आठ याम होते हैं, ऐसा पहले (सूत्र 18) कहा गया है। उदयात् ही से निशापति या चन्द्रमा के चारों (1.) जय, (2.) विजय, (3.) महाशङ्कु, और (4.) शङ्कुक ये (याम) कहे गए हैं। अथ तिथ्यादीनामाह — अहोरात्रैस्तिथेर्नाम प्रोक्तं नन्दादिपञ्चकम् । नन्दा भद्रा जया रिक्ता पूर्णा वै पञ्चमी स्मृता ॥ ५ ॥ पञ्च पञ्च पुनः पञ्च मासार्धे तिथयस्तथा । तिथिभिः पञ्चदशभिः पक्षो मासो द्विपक्षतः ॥ ६ ॥ दिन-रातों के तिथियों के नाम नन्दादि पाँच क्रम से कहे गए हैं— नन्दा (1, 6, 11), भद्रा (2, 7, 12), जया (3, 8, 13), रिक्ता (4, 9, 14) और पाँचवीं पूर्णा (5, 10, 15, 30) तिथियाँ हैं। इस प्रकार मासार्ध में ये पाँच-पाँच और पाँच तीन बार तिथियाँ होती हैं। ऐसी पन्द्रह तिथियों से पक्ष या पखवाड़ा बनता है और दो पक्षों से एक मास होता है। तथा च स्पष्टाह— आदौ नन्दादिकश्चैवं कालः स्याद् दशपञ्चभिः$_{15}$ । नन्दा प्रतिगदा$_1$ ज्ञेया द्वितीया$_2$ भद्रिका मता ॥ ७ ॥ तृतीया$_3$ च जया रिक्ता चतुर्थी$_4$ सम्प्रकीर्तिता । तिथिः पूर्णा पञ्चमी$_5$ स्यादेवं हि तिथयो मताः ॥ ८ ॥

84 अपराजितपृच्छा षष्ठी₆ च सप्तमी₇ चैव ह्यष्टमी₈ नवमी₉ तथा। दशम्ये₁₀कादशी₁₁ चैव द्वादशी₁₂ च त्रयोदशी₁₃ ॥ ९॥ चतुर्दशी₁₄ पौर्णमासी₁₅ तिथयश्चन्द्रसम्भवाः। चन्द्रस्तु षोडश₁₆कलस्तिथयो दशपञ्चभिः₁₅ ॥ १० ॥ नन्दादिक से आदि करके काल पन्द्रह होते हैं। प्रतिपदा को नन्दा, द्वितीया को भद्रा, तृतीया को जय, चतुर्थी को रिक्ता और पञ्चमी को पूर्णातिथि कहा जाता है, और ऐसे ही आगे (इसी क्रम से षष्ठ्यादि से न्यास करने पर) अन्य तिथियाँ होती है। षष्ठी, सप्तमी, अष्टमी, नवमी, दशमी, एकादशी, द्वादशी, त्रयोदशी, चतुर्दशी और पूर्णमासी तिथियाँ चन्द्रमा से बनती है। चन्द्रमा की सोलह कलाएँ हैं और तिथियाँ पन्द्रह हैं। षोडशचन्द्रकलामाह — शशिनी शान्तिनी चैव लक्ष्मणी कामिनी तथा। पुषिणी च शुभा शान्ता चाह्लादा कुमुदा तथा ॥ ११ ॥ शस्याशिनी मानिनी च तथा विद्याविशोधिनी। महिषी द्वीपिनी सौम्या चामृता षोडशी तथा ॥ १२ ॥ चन्द्रमा की सोलह कलाएँ इस प्रकार हैं— (1.) शशिनी, (2.) शान्तिनी, (3.) लक्ष्मणी, (4.) कामिनी, (5.) पुषिणी, (6.) शुभा, (7.) शान्ता (8.) आह्लादा, (9.) कुमुदा, (10.) शश्याशिनी, (11.) मानिनी, (12.) विद्या विशोधिनी, (13.) महिषी, (14.) द्वीपिनी, (15.) सौम्या और सोलहवीं (16.) अमृता। सितपक्षे वर्द्धते च क्षीयते कृष्णपक्षके। पूर्णिमा पूर्णचन्द्रेऽमावास्या क्षीणविधौ स्मृता ॥ १३ ॥ शुक्लपक्ष में चन्द्रमा की कलाएँ बढ़ती हैं और कृष्णपक्ष में घटती जाती हैं। पूर्णचन्द्र होने पर पूर्णिमा कही जाती है और चन्द्रमा के क्षीण हो जाने को अमावस्या कहा जाता है। मासनामानि — पूर्णमासे उभौपक्षावथ मासाभिधेयकम्। कार्त्तिको मार्गशीर्षश्च पौषो माघोऽथ फाल्गुनः ॥ १४ ॥ चैत्रौ वैशाखज्येष्ठौ च ह्याषाढश्चैव श्रावणः।

सूत्र-१९ 85 पूर्णमास दो पक्षों का होता है। इसे ही मास का नाम दिया गया है। कार्तिक, मार्गशीर्ष, पौष, माघ, फाल्गुन, चैत्र, वैशाख, ज्येष्ठ, आषाढ़, श्रावण, भाद्रपद और आश्विन— ये बारहों मासों के नाम हैं। कार्तिक्यात्षडृतुवः — कार्तिकाद्या द्वादशस्युर्याभ्यां द्वाभ्यामृतूद्भवः । अभिधानानि कथये षडृतूनामनुक्रमात् ॥ 16 ॥ कार्तिक आदि से आरम्भ करके बारहों मास में दो-दो मास की ऋतुएँ होती हैं। इन षट् ऋतुओं के नाम अनुक्रम से कहता हूँ— वसन्तग्रीष्मौ वर्षाश्च शरद्धेमन्त एव च। शिशिरश्च षडृतवश्चैत्रिकादिद्विमासकाः ॥ 17 ॥ (1.) वसन्त, (2.) ग्रीष्म, (3.) वर्षा, (4.) शरद, (5.) हेमन्त और (6.) शिशिर— ये दो-दो मास की ऋतुएँ चैत्रादि मास से क्रमशः होती है। वार्षिकात्मकद्वैर्तुकालमाह — द्वौ ऋतू भवतः कालः शीतोष्णवार्षिकात्मकः। दो ऋतुओं का काल भी होता है जो एक वर्ष में शीत और ग्रीष्म ऋतु दो नामों से जाना जाता है। त्र्यर्तुकालमाह — कीर्तिकादिभवः शीतो ग्रीष्मः फाल्गुनतः स्मृतः ॥ 18 ॥ तथाषाढादितः प्रावृट् सर्वबीजहितात्मिका । एवं स्यात् त्रिविधः कालः शीतोष्णप्रावृडात्मकः ॥ 19 ॥ कार्तिक से आरम्भ होने वाले को शीत एवं फाल्गुन से आरम्भ होने वाले काल को ग्रीष्म कहते हैं तथा आषाढ़ से आरम्भ होने वाली ऋतु को प्रावृट् या वर्षाकाल कहा जाता है जो कि समस्त बीजों के लिए हितकारी है। इस तरह शीत, ग्रीष्म और वर्षाकाल— ये तीन काल होते हैं। कालत्रयं षडृतबो माससङ्ख्यातु द्वादश₁₂ । चतुर्विंशति₂₄ पक्षाश्च षष्ठ्युत्तरशतत्रयम्₃₆₀ ॥ 20 ॥ दिनानि स्युस्तथा चैवं वर्ष चैव प्रवर्तते । इत्यादियुक्तियोगेन प्रोक्तः संवत्सराभिधः ॥ 21 ॥ जैसा कि कहा गया है कि काल तीन हैं, ऋतुएँ छह हैं और मास बारह हैं जबकि पक्ष चौबीस। इनमें सामान्यतः तीन सौ साठ दिन होते हैं। इतने ही दिनों से

86 अपराजितपृच्छा अर्थात् तीन सौ साठ दिनों से (सौर) वर्ष बनता है¹ और इस तरह पूरे युक्तिक्रम से संवत्सर के नामों को बताया गया है। अथ प्रभवादिशष्ठिसंवत्सरनामानि — संवत्सराभिधानानि षष्टिः स्युः प्रभवादितः । प्रभवो विभवश्चैव शुक्लो मोदः प्रजापतिः ॥ २२ ॥ अङ्गिराः श्रीमुखो भावो युवा धाता तथेश्वरः । बहुधान्यः प्रमाथी च विक्रमो वृष एव च ॥ २३ ॥ चित्रभानुः सुभानुश्च तारणः पार्थिवो व्ययः । सर्वजित्सर्वधारी च विरोधी विकृतिः खरः ॥ २४ ॥ नन्दनो विजयो जयो मन्मथो दुर्मुखस्तथा । हेमलम्बो विलम्बश्च विकारी शर्वरी तथा ॥ २५ ॥ प्लवश्च शुभकृच्चैव शोभनः क्रोधनस्तथा । विश्वावसुः पराभवः प्लवङ्गः कीलको मतः ॥ २६ ॥ सौम्यः साधारणश्चैव तथैवं च विरोधकृत् । परिधावी प्रमादी च ह्यानन्दो राक्षसोऽनलः ॥ २७ ॥ पिङ्गलः कालयुक्तश्च सिद्धार्थो रौद्रदुर्मती । दुन्दुभी रुधिरोद्गारी रक्ताक्षी क्रोधनः क्षयः ॥ २८ ॥ इत्थं संवत्सराणां च षष्ठीभेदाः प्रकीर्तिताः । प्रभवादि से कुल साठ संवत्सर होते हैं जिनके नाम क्रमशः निम्न हैं— (1.) प्रभव, (2.) विभव, (3.) शुक्ल, (4.) मोद, (5.) प्रजापति, (6.) अङ्गिरा, (7.) श्रीमुख, (8.) भाव, (9.) युवा, (10.) धाता, (11.) ईश्वर, (12.) बहुधान्य, (13.) प्रमाथी, (14.) विक्रम, (15.) वृष, (16.) चित्रभानु, (17.) सुभानु, (18.) तारण, (19.) पार्थिव, (20.) व्यय, (21.) सर्वजित्, (22.) सर्वधारी, (23.) विरोधी, (24.) विकृत, (25.) खर, (26.) नन्दन, (27.) विजय, (28.) जय, (29.) मन्मथ, (30.) दुर्मुख, (31.) हेमलम्ब, (32.) विलम्ब, (33.) विकारी, (34.) शर्वरी, (35.) प्लव, (36.) शुभकृत्, (37.) शोभन, (38.) क्रोधी, (39.) विश्वावसु, (40.) पराभव, (41.) प्लवङ्ग, (42.)

  1. कुल 360 दिन का सौर वर्षमान होता है। ज्योतिर्विदाभरण में आया है ; सौरा नभो₀ऽङ्गा₆ग्नि₃मितानी वासरा। (ज्योतिर्विदाभरण प्रथम प्रकरण, 25)

सूत्र-१९ ८१ कीलक, (43.) सौम्य, (44.) साधारण, (45.) विरोधकृत, (46.) परिधावी, (47.) प्रमादी, (48.) आनन्द, (49.) राक्षस, (50.) नल, (51.) पिङ्गल, (52.) कालयुक्त, (53.) सिद्धार्थ, (54.) रौद्र, (55.) दुर्मती, (56.) दुन्दुभि, (57.) रुधिरोद्गारी, (58.) रक्ताक्ष, (59.) क्रोधन तथा (60.) क्षय— ये साठ संवत्सर के नाम कहे गए हैं।¹ एतद्विंशत्यानि — ब्रह्मसृष्टिर्विंशतिश्च प्रभवादि व्ययान्तगा ॥ २९ ॥ विष्णोः सर्वजिदाद्याश्च विंशतिश्चापराभवम् । प्लवङ्गादि क्षयान्त च तथास्याद्रुद्रविंशतिः ॥ ३० ॥ गुणा यथाभिधानं च शस्ताशस्ते विदुर्बुधाः । (इनमें से बीस-बीस संवत्सर क्रमशः ब्रह्म, विष्णु व रुद्रबीसी संज्ञक है) प्रभव से लेकर व्यय तक के बीस संवत्सरों को ब्रह्मसृष्टिर्विंशति या ब्रह्म-बीसी कहा जाता है। सर्वजित से पराभव तक बीस संवत्सरों को विष्णुसृष्टिर्विंशति या विष्णु- बीसी और प्लवङ्ग से क्षय संवत्सर तक की गणना रुद्रसृष्टिर्विंशति या रुद्र-बीसी के अन्तर्गत होती है। इन संवत्सरों के जैसे नाम हैं, वैसे ही इनके प्रशस्त-अप्रशस्त गुण भी होते हैं, ऐसा विद्वान जानते हैं। युगमानं च कल्पान्तमथ मन्वन्तरं तथा । दिनसङ्ख्या प्रमाणेन तथा युगचतुष्टयम् ॥ ३१ ॥ कल्पान्त से आरम्भ करके मन्वन्तर तक की दिन संख्या को युगमान प्रमाण


१. तथा च ज्योतिषरत्नमालायां— प्रभवविभवाख्यशुक्लाः प्रमोदनामा प्रजापतिरथाब्दः। परतोऽङ्गिरास्ततश्च श्रीमुखभावौ युवाख्योऽन्यु॥ धातेश्वरव्यहुधान्यौ प्रमाथिनामाथ विक्रमाख्यातः। सवृषोऽथ चित्रभानुस्मात्सुभानुरथ तारणाख्यश्च॥ पार्थिवनामाव्यय इति सर्वजिदाख्यो सर्वधारी च। तदनु विरोधी विकृतः खरनन्दनजयविजयसञ्ज्ञाः॥ मन्मथदुर्मुखसञ्ज्ञावथापरौ हेमलम्बकविलम्बौ। तद्वद्विकारिनामाथ शर्वरी प्लव इति च शुभकृच्च॥ शोभनकृदथ परः क्रोधीविश्वावसुस्तनुपराभवाख्यश्च। परतः प्लवङ्गनामाकीलक इति सौम्यसञ्ज्ञश्च॥ साधारणो विरोधकृदथपरिधा विप्रमादिनामानौ। आनन्दराक्षसाख्यौ नलपिङ्गलकालयुक्ताश्च॥ सिद्धार्थरौद्रदुर्मति दुन्दुभयोवत्सराः क्रमादपरे। रुधिरोद्गारीरक्ताक्ष सञ्ज्ञकः क्रोधनः क्षयकृत्॥ (ज्योतिषरत्नमाला 1, 4-10) श्रीपति का मत है कि गुरु के मध्यम गति से एक राशि के भोग समय को वत्सर माना गया है अर्थात् गुरु अपनी मध्यम गति से चलता हुआ एक राशि का जब तक उपभोग करता है, उतने समय तक एक प्रभवादि संवत् का समय होता है। गुरु के मान से ही प्रभवादि साठ वर्षों की गणना प्रवृत्ति को स्वीकारा गया है— इयं हि षष्टिःपरिवत्सराणां बृहस्पतेर्मध्यमराशिभोगात्। उदाहता पूर्वमुनिप्रवर्यैर्नियोजनीया गणना क्रमेण॥ (तत्रैव 1, 11)

88 अपराजितपृच्छा बताकर युग चतुष्टय— कृतयुग, त्रेता, द्वापर और कलियुग कहे गए हैं। इति सूत्रसन्तानगुणकीर्तिप्रकाशप्रोक्तश्रीभुवनदेवाचार्योक्तापराजितपृच्छायां तिथिमासर्तुकालसंवत्सराद्यधिकार एकोनविंशं सूत्रम् ॥ 19 ॥ इस प्रकार भुवनदेवाचार्य कृत सूत्रसन्तानगुणकीर्ति प्रकाश या अपराजितपृच्छा में तिथि, मास, ऋतुकाल, संवत्सरादि अधिकार नामक उन्नीसवाँ सूत्र पूर्ण हुआ ॥ 19 ॥ कल्पान्तो नाम विंशं सूत्रम् ॥ 20 ॥ अपराजित उवाच — संवत्सरास्तु कथिता मन्मनोभ्रान्तिहारकाः । युगानां तु प्रमाणं च कथयस्व परेश्वर ॥ 1 ॥ मन्वन्तरप्रमाणं किम् कथं युगचतुष्टयम् । कल्पान्तं च कथं देव प्रसादं कुरु मे प्रभो ॥ 2 ॥ अपराजित बोले— हे परमेश्वर ! आपने संवत्सरों के बारे में कहकर मेरे मन की भ्रान्ति का निवारण कर दिया है। अब कृपा करके युगों के प्रमाण कहिए। मन्वन्तरों का क्या प्रमाण है, चारों युगों का प्रमाण क्या है, कल्पान्त किसे कहते हैं। हे प्रभु! कृपा करके मुझे कहिए। विश्वकर्मोवाच — अतस्तात प्रवक्ष्यामि प्रमाणं तु युगोद्भवम् । चतुर्दशमन्वन्तरैः कल्पमेकं तु सङ्ख्यया ॥ 3 ॥ येन सङ्ख्याप्रमाणं च वत्सरादि प्रवर्तते । अनुक्रमेण वक्ष्यामि यथा प्रोक्तं पृथग्विधम् ॥ 4 ॥ विश्वकर्मा ने कहा — हे प्रिय ! अब मैं तुम्हें युगोद्भव के प्रमाण के बारे में कहता हूँ। पहले यह समझ लो कि चौदह मन्वन्तरों की संख्या से एक कल्प होता है। जिन संख्या प्रमाणों से इनके वर्ष आदि होते हैं, उनके विषय में भी मैं यहाँ अनुक्रम से कहता हूँ। युग प्रमाणमाह — अष्टाविंशतिसहस्त्राण्यग्रे चाष्टशतानि च। संवत्सरैश्च गुणयेत् कृतसङ्ख्याप्रमाणतः ॥ 5 ॥ एक गणना के अनुसार 28 हजार को 8 सौ से गुणित करने पर (22, 40000) कृतयुग अर्थात् सत्ययुग की वर्ष प्रमाण संख्या होती है।

सूत्र-२० सहस्राण्यष्टाविंशतिर्लक्षाणि दशसप्त च। प्रमाणं कृतयुगस्य दैवज्ञैश्च प्रभाषितम् ॥ ६ ॥ (किन्तु) दैवज्ञों ने 17, 28, 000 की वर्ष संख्या को भी कृतयुग की वर्ष संख्या माना है।¹ तस्य पादत्रयं त्रेता द्वापरं तत्पदद्वयम्। पादमेकं कलियुगं प्रमाणमुदितं त्विदम् ॥ ७ ॥ उक्त संख्या के तीन पाद (अर्थात् 17, 28, 000 × 3/4 = 12, 96, 000 वर्ष) त्रेतायुग की, इसके दो पाद के बराबर अर्थात् (17, 28, 000 × 1/2 = 8, 64, 000 वर्ष) द्वापर की तथा इसके एक पाद के बराबर अर्थात् (17, 28, 000 × 1/4 = 4, 32, 000 वर्ष) कलियुग का वर्ष संख्या का प्रमाण कहा है।² तथा युगचतुष्कं च चतुर्भिश्च युगैर्भवेत्। चतुष्कस्य प्रमाणं च कथयामि यथाक्रमम् ॥ ८ ॥ इस प्रकार इन चारों की वर्ष संख्या को जोड़ने पर युगचतुष्क बनता है जिसकी प्रामाणिक वर्ष संख्या मैं यथाक्रम से कहता हूँ। त्रिचत्वारिंशल्लक्षाणि सहस्राणां च विंशतिः। चतुष्कस्य प्रमाणं च सृष्टिकालसमुद्भवम् ॥ ९ ॥ १. युगादि के कालमान को लेकर कई मत है, उक्त गणना सिद्धान्तशिरोमणि के अनुसार हैं जबकि विष्णुपुराणकार ने माना है कि पुराविदों ने सतयुग आदि का परिमाण क्रमशः चार, तीन, दो एवं एक हजार दिव्य वर्ष बतलाया है। प्रत्येक युग के पूर्व उतने ही सौ वर्ष की सन्ध्या बताई जाती है और युग के पीछे उतने ही परिमाणवाले सन्ध्यांश होते हैं। इन सन्ध्याओं व सन्ध्यांशों के बीच का जितना काल होता है, उसे ही कृतादि नाम वाले युग जाने - दिव्याब्दानां सहस्राणि युगेष्वाहुः पुराविदः ॥ तत्प्रमाणैः शतैः सन्ध्या पूर्वा तत्राभिधीयते। सन्ध्यांशश्चैव तत्तुल्यो युगस्यानन्तरो हि सः ॥ सन्ध्यासन्ध्यांशयोरन्तर्यः कालो मुनिसत्तम। युगाख्यः स तु विज्ञेयः कृतत्रेतादिसञ्ज्ञितः ॥ (विष्णुपुराण 1, 3, 12-14) उक्त श्लोक ब्रह्मगुप्त के मत से तुलनीय है। ब्राह्मस्फुटसिद्धान्त में आया है - प्राणैर्विनाडिकार्क्षी षड्भिर्घटिका विनाडिका षष्ट्या । घटिका षष्ट्या दिवसो दिवसानां त्रिंशता मासाः ॥ मासा द्वादशवर्षं विकलालिसांशराशिभगणान्तः । क्षेत्रविभागस्तुल्यः कालेन विनाडिकाद्येन ॥ स्वचतुष्टयरदवेदा रविवर्षाणां चतुर्युगं भवति। 4320000 सन्ध्या सन्ध्यांशै सह चत्वारि पृथकृतादीनि ॥ युगदशभागो गुणितः कृतं चतुर्भिस्त्रिर्गुणस्त्रेता। द्विगुणो द्वापरमेकेन सङ्गुणः कलियुगं भवति ॥ (ब्राह्मस्फुट. पूर्वाद्शाध्याय्यां, मध्यम., 5-8) २. भोजराज का मत है कि उनको चार से गुणा किया जाए तो कृतयुग का प्रमाण होगा, तीन से गुणा करने पर त्रेता, दो से गुणा करने पर द्वापर और एक से गुणा करने पर कलियुग होगा : तद्दशगुणितं कृतं चतुर्भिस्त्रिभिस्त्रेता । द्विगुणो द्वापरं एवं कलिरेकगुणः समाख्यातः ॥ (राजमार्तण्ड 1440)

तियालीस लाख बीस हजार वर्ष संख्या का प्रमाण अर्थात् (43, 20, 000 वर्ष) सृष्टि के आरम्भ काल से एक चतुर्युग या एक युगचतुष्क पूरा होने तक समझें। द्वासप्ततिचतुष्काणि मनुश्चैव प्रवर्तते। कालसङ्ख्या मनोः प्रोक्ताः पृथक् सङ्ख्या चतुर्दश₁₄ ॥ 10 ॥ ऐसी बहत्तर (अन्य ज्योतिषीय गणनानुसार 71)¹ चतुर्युगियों में 14 मनु की स्थिति है जिनकी यह काल संख्या चौदह मनुओं की है। संभूक्षे तलाभिधानं च प्रारमुनिस्तृतीयकम ? । सङ्कल्पभाव सांतश्च सावर्णिकस्यानु सप्तमम् ? ॥ 11 ॥ समनु प्लवसौम्याश्च आह्लादश्च सूर्यात्मकः। त्रिदशाक्ष पूर्णस्य तु सप्तभि र्न चतुर्दश ? ॥ 12 ॥ (दोनों श्लोकों का पाठ भ्रष्ट होने से विष्णु व मार्कण्डेय पुराणों के प्रमाणानुसार) चौदह मनुओं के नाम इस प्रकार हैं- (1.) स्वायम्भुव, (2.) स्वारोचिष, (3.) उत्तम, (4.) तामस, (5.) रैवत और (6.) चाक्षुष। वर्तमान मन्वन्तर (7.) वैवस्वत है जबकि भविष्य के मनु हैं- (8.) सावर्णि, (9.) दक्षसावर्णि, (10.) ब्रह्मसावर्णि, (11.) धर्मसावर्णि, (12.) रुद्रसावर्णि, (13.) रुचिसावर्णि और (14.) भौमसावर्णि ²

  1. पौराणिक गणनाओं में कृतादि चतुर्युगों के एक हजार चतुर्युग का ब्रह्मा का एक दिन होता है। इस एक दिन में चौदह मनु होते हैं। सप्तर्षि, देवगण, इन्द्र, मनु और मनु के पुत्र राजा लोग एक ही काल में रचे जाते हैं और एक ही काल में उनका संहार होता है। इकहत्तर चतुर्युग से कुछ अधिक काल का एक मन्वन्तर होता है। इकहत्तर चतुर्युग की गणना से चौदह मन्वन्तरों में 994 चतुर्युग होते हैं और ब्रह्मा के एक दिन में एक हजार चतुर्युग होते हैं, अतः छह चतुर्युग शेष रहते हैं। छह चतुर्युग का चौदहवाँ भाग कुछ कम पाँच हजार एक सौ तीन दिव्य वर्ष होता है, इस प्रकार से एक मन्वन्तर में इकहत्तर चतुर्युग के अलावा इतने दिव्य वर्ष और अधिक होते हैं। विष्णुपुराण में आया है- कृतं त्रेता द्वापरश्च कलिश्चैव चतुर्युगम् ।.. सप्तर्षयः सुराः शक्रो मनुस्तत्सूनवो नृपाः। एककाले हि सृज्यन्ते संह्रियन्ते च पूर्ववत् ॥ चतुर्युगाणां सङ्ख्याता साधिका ह्येकसप्ततिः। मन्वन्तरं मनोः कालः सुरादीनां च सत्तम ॥ (विष्णुपुराण 1, 3 15 एवं 17-18)
  2. विष्णुपुराण (1, 3, 1-2 एवं 6, 3, 6-11); मार्कण्डेयपुराण (53वें अध्याय) में भौम का नाम भौत्य भी आया है और अन्यत्र इसका नाम इन्द्रसावर्णि भी मिलता है। इस सम्बन्ध में सामान्यतया गणनाएँ इस प्रकार की गई है- मानव का 1 मास = पितृ का एक दिन-रात। मनुष्य का एक वर्ष = देवता का 1 दिन-रात। मनुष्य के तीन वर्ष = देवता का 1 मास। मनुष्य के 360 वर्ष = देवता का एक दिव्य वर्ष। 432000 मानव वर्ष = 1200 दिव्य वर्ष = 1 कलियुग। 864000 मानव वर्ष = 2400 दिव्य वर्ष = 1 द्वापर। 1296000 मानव वर्ष = 3600 दिव्य वर्ष = 1 त्रेतायुग। 1728000 मानव वर्ष = 4800 दिव्य वर्ष

सूत्र-२० 91 मनुभिश्चतुर्दशभिः कल्पसङ्ख्या प्रमाणतः । एवमुक्तं च कल्पान्तं पुनरेवं समुद्भवः ॥ 13 ॥ इन चौदह मनुओं की कुल वर्ष संख्या को एक कल्प की संख्या का प्रमाण कहा है। इस प्रकार कहे गए कल्प के अन्त में यह सृष्टि पुनः उत्पन्न होती है। अपराजित उवाच – कल्पान्तश्च कथं तात कैश्चिह्नैरुपलक्षितः । देवेशाहं न जानामि कल्पान्ते सृष्टिच्छन्दकम् ॥ 14 ॥ अपराजित ने पूछा कि हे तात ! कल्पान्त के समय क्या-क्या चिह्न उपस्थित होते हैं ? हे देवेश ! कल्पान्त के बाद सृष्टि का कैसा छन्द होगा, कैसी रचना होगी, यह मैं नहीं जान पाता हूँ। विश्वकर्मोवाच – कल्पान्तो प्राप्यते वत्स ह्युल्कापातैरनेकशः । तस्य चिह्नानि रूपाणि कथयामि समासतः ॥ 15 ॥ विश्वकर्मा बोले – कल्पान्त आने पर अनेकशः उल्कापात होते हैं, उनके चिह्न और रूप मैं संक्षेप में कहता हूँ। कल्पान्तचिह्नादीनामाह – उल्कापाताद् वज्रघातादन्नाभावाज्जनात्ययः । सादित्ये च विनामेघैर्वज्रविद्युत्पातोद्भवः ॥ 16 ॥ अब्दान्ते भूमिकम्पश्च ह्याब्दार्धे तु पुनः पुनः । पांशुवृष्टिश्च पतति सादित्ये रजनी यथा ॥ 17 ॥ उल्कापात से, वज्राघात से अर्थात् बिजली गिरने से, अन्न के अभाव में प्रजा दुखी हो जाती है। सूर्य का आतप असहनीय हो जाता है और बिना मेघों के भी = 1 कृत युग। इन सबको मिलाकर योग 43, 20, 000 मानव वर्ष = 12000 दिव्य वर्ष = 1 महायुग या चतुर्युगी। इस प्रकार एक चतुर्युगी में 12000 दिव्य वर्ष या 43 लाख 20 हजार मानव वर्ष होते हैं और इसी को महायुग कहा जाता है। यह भी स्पष्ट है कि प्रत्येक युग में सन्ध्या, मुख्यभाग और सन्ध्यांश नाम से तीन-तीन गणनाएँ होती हैं। यह गणना इस प्रकार होती है। जैसे— कृतयुग में सन्ध्या 400 वर्ष, मुख्यभाग 4000 तथा सन्ध्यांश 400 वर्ष का है। त्रेतायुग में सन्ध्या 300 मुख्यभाग 3000 तथा सन्ध्यांश 300, द्वापर में सन्ध्या 200, मुख्यभाग 2000 तथा सन्ध्यांश 200 और कलिकाल में सन्ध्या 100 मुख्यभाग 1000 तथा सन्ध्यांश 100 वर्ष का होता है। प्रो. ह्विटने का कथन है कि 12000 वर्षों को देववर्ष मानने की कल्पना मनु की नहीं है, बहुत बाद की है। (सूर्यसिद्धान्त : जे. बर्गेस द्वारा अनूदित पृष्ठ 10)

वज्र, विद्युत्पात होने लगते हैं। वर्ष के अन्त में भूकम्प होते हैं। कभी-कभी वर्ष के आधे में भी रह-रहकर भूकम्प पुनः होते हैं। दिन-रात धूल की वृष्टि होती है। यमदंष्ट्रासमं रौद्रं भूतलं च प्रदृश्यते। आन्ध्यं घोरं भवेन्मेघैः सर्पवृष्टिः प्रजायते ॥ 18 ॥ ·स्वर्गतः पतति त्वेवं पुरुषो विकृताननः। सर्वेशे सौरसम्भ्रूया मनुजा वीरविक्रमाः ? ॥ 19 ॥ चारों ही ओर यम के दाढ़ों वाले रौद्र रूप भूतल पर दिखाई देने लगते हैं। घोर आँधियाँ चलती हैं और मेघों से सर्पों की वर्षा होती है। स्वर्ग से ऐसे-ऐसे विकृत मुँहों वाले लोग गिरते हैं जो सभी वीर विक्रम मनुष्य सौर सम्भूया अर्थात् उग्र प्रकृति लिए होते हैं। यक्ष किन्नरगन्धर्वाः पिशाचोरगराक्षसाः। सर्वे ते प्रलयं यान्ति कल्पान्ते च समुत्थिते ॥ 20 ॥ पर्वताः सागरा द्वीपाः सरितः सागरादिकम्। भक्षन्ति सर्वभूतानि कालाग्निश्च यमो यथा ॥ 21 ॥ कल्पान्त के होने पर यक्ष, किन्नर, गन्धर्व, पिशाच, उरग, राक्षस आदि सभी प्रलय में समाप्त हो जाते हैं। पर्वत, सागर, द्वीप, नदियाँ, सागरादि सब लोगों को ऐसे ही खा जाते हैं जैसे कालाग्नि में यम सब का भक्षण कर लेता है। चतुर्दशमन्वन्ते च दिने प्राप्ते यथा ध्रुवम्। रजन्यन्ते च सम्प्राप्ते ह्युदिते सूर्यमण्डले ॥ 22 ॥ बिम्बमध्यसमास्त्वेवं पुरुषाननसंनिभाः। विकृताननरूपाश्च दंष्ट्रायुक्ताः करालिनः ॥ 23 ॥ चौदह मनुओं के अन्त में पुनः दिन यथा ध्रुवं- सदा की भाँति होने लगते हैं जैसे रजनी-रात्रि के अन्त होने पर सूर्य मण्डल का उदय होता है और सूर्य मण्डल के समस्त बिम्बों में कराल दांत किटकिटाते हुए विकृत, खूँखार मुँह वाले मनुष्यों के मुखों के समान दिखाई पड़ते हैं। द्वौ सूर्यौ पूर्वदिग्भागे द्वो च दक्षिणदिक्स्थितौ। सूर्यद्वयं पश्चिमे चोत्तरे सूर्यद्वयोदयः ॥ 24 ॥ द्वौ सूर्यौ नागलोकस्थौ द्वौ सूर्याबुपरि स्थितौ। इत्थं ते द्वादशादित्याः कल्पान्ते सर्वतो दिशम् ॥ 25 ॥ दहन्ति पृथिवीं कृत्स्नां सशैलवनकाननाम्।

सूत्र - १० सर्वभूतानि दहति कालाग्निश्चापरस्तथा ॥ २६ ॥ कल्पान्त में सभी दिशाओं में भीषण सूर्यों का आतप फैल जाता है— पूर्व में दो सूर्य, दक्षिण में दो, पश्चिम में दो, उत्तर में दो सूर्य; नागलोक, पाताल में दो सूर्य और आकाश में ऊपर की ओर भी दो सूर्य— इस प्रकार बारहों आदित्य कल्पान्त में सभी दिशाओं से पृथ्वी को इस प्रकार जलाने लगते हैं मानों कालाग्नि में जल रहे हों। देवदानवगन्धर्वान् पिशाचोरगराक्षसान् । पृथिव्यां दह्यमानायां हविर्गन्धः प्रजायते ॥ २७ ॥ अस्तंगते सूर्यबिम्बे द्रोणमेघोद्भवस्तथा । वर्षन्ते च महोमेघा धारा करिकरानिव ॥ २८ ॥ इस तरह देवों, दानवों, गन्धवों, पिशाचों, उरगों, राक्षसों और पृथ्वीवासी मनुष्यों के जलने से ऐसी दुर्गन्ध प्रसारित हो जाती है जैसी पशुओं की हवि देने पर फैलती है। सूर्य बिम्ब के अस्तंगत होने पर भयङ्कर द्रोण मेघों का उदय होता है। वे बहुत घनी वर्षा करते हैं। इन महामेघों से होने वाली भयानक वर्षा की झड़ी और धाराएँ ऐसी लगती है मानों विशाल हाथी अपनी सूण्ड से पानी की भयङ्कर बौछार कर रहे हों। अष्टादशैव मेघाश्च महाद्रोणघनोदये । पृथिवीत्थं समन्ताच्य समुद्रैश्चार्णवीकृता ॥ २९ ॥ चतुर्दशलक्षयोजनानि ध्रुवं रक्षतु उदकोद्भवम् । तमस्त्रौ विशीर्यन्ते अम्भोर्भव तनो वृता ? ॥ ३० ॥ अन्धकारे तथा घोरे नष्टे स्थावरजङ्गमे । चन्द्रार्कपवने नष्टे ज्योतिषि प्रलयं गते ॥ ३१ ॥ इस तरह प्रलयङ्कारी महाद्रोण मेघों के उदय होने पर अठारहों प्रकार के मेघ चारों ओर से घिर आते हैं और समस्त पृथ्वी को भयानक वर्षा से आप्लावित करके एक तरह से चारों ओर समुद्र रूप में अर्णवीकृत कर देते हैं। जल ही जल का सागर बना देते हैं। चौदह लाख योजनों तक यह जल चारों ओर एक तरह से ध्रुव रूप से, स्थायी लगने लगता है और जब रात्रि की तमिस्रा अर्थात् अन्धकार मिटने लगता है और पुनः सूर्य बिम्ब का उदय होने लगता हे तो इस जल से आवृत्ता सभी स्थावर, जङ्गम जीव, चन्द्र, सूर्य, पवन, ज्योतियाँ आदि जो अन्धकार में नष्ट होकर प्रलय को प्राप्त हो गई थीं (पुनः सृष्टिभूत होने लगती हैं)।

94 अपराजितपृच्छा एवं जाते तदाकाले विष्णौ क्षीरोदसंस्थिते। क्षीरोदस्थितविष्णोश्च शेषपर्यङ्कशायिनः ॥ ३२ ॥ नाभेर्ब्रह्मा समुत्पन्नः पद्मयोनिश्च सृष्टिकृत्। ततः सर्वं समुत्पन्नं जगत्स्थावरजङ्गमम् ॥ ३३ ॥ ऐसे हो जाने पर तब क्षीरसागर में शेषनाग के पर्यङ्क पर सोने वाले विष्णु की नाभि से निकलने वाले कमल नाल से पद्मयोनि से जन्म लेने वाले ब्रह्मा पुनः सृष्टि की रचना करते हैं जिससे सभी स्थावर, जङ्गम जीवों की उत्पत्ति होती है। योऽसौ क्षीरोदमध्ये तु सप्तलोकजलाम्बुधौ। शेषे च नागपर्यङ्के शेषस्याहेश्च तद्विधिः ? ॥ ३४ ॥ ............. फणिमणिकिरणैर्व्यज्यते श्वासवातैः। ............. ऋषिमुनिगणैर्ऋग्यजुः साममन्त्रैः। ............. स्तूयमानो ............ ब्रह्मादि देवैः। विष्णुस्त्रैलोक्यनाथः कलिकलुषहरः पातु वैः पद्मनाभः ॥ ३५ ॥ इस प्रकार ये सभी जीव क्षीर समुद्र में सप्तलोक में व्याप्त जलाम्बुधि अर्थात् सागर में शेषशय्या के नाग पर्यङ्क पर सोये हुए विष्णु भगवान् कलि-कलुष के हरने वाले प्रभु की सर्प तो अपने फणों मणियों से श्वासाघात से पँखा करके और ऋषि मुनिगण ऋक्, यजु और साम मन्त्रों से तथा ब्रह्मादि देवतागण उनकी स्तुतिगान करके, उन पद्मनाभ भगवान विष्णु से रक्षा की प्रार्थना करते हैं। इति सूत्रसन्तानगुणकीर्तिप्रकाशप्रोक्तश्रीभुवनदेवाचार्योक्तापराजितपृच्छायां कल्पान्ताधिकारो नाम विंशं सूत्रम् ॥ २० ॥ इस प्रकार भुवनदेवाचार्य कृत सूत्रसन्तानगुणकीर्ति प्रकाश या अपराजितपृच्छा में कल्पान्त अधिकार नामक बीसवाँ सूत्र पूर्ण हुआ ॥ २० ॥ अक्षयलिङ्गसृष्ट्युद्भवो नामैकविंशं सूत्रम् ॥ २१ ॥ अपराजित उवाच - पूर्वसृष्ट्युद्भवो यद्वत्तथा तन्नाम देवता। अन्यथा वा भवेदिन्द्रस्तथा च त्रिदशोद्भवः ॥ १ ॥ उपस्थिते च कल्पान्ते किं पुनः सृष्टिरुद्भवेत्। पूर्वाभिधानयुक्ता चान्यथा वा कथय प्रभो ॥ २ ॥

सूत्र-२१ 95 अपराजित बोले — पूर्व में जिस प्रकार से सृष्टि उत्पन्न हुई और उसके नाम के जो-जो देवता हुए, क्या उनसे अन्यथा अर्थात् अन्य प्रकार के इन्द्र और देवता, कल्पान्त के उपस्थित होने पर पुनः उत्पन्न होते हैं? हे प्रभु! क्या वे पहले का नाम, धाम वाले ही होते हैं या अन्य प्रकार के होते हैं, यह सब आप कहिए। विश्वकर्मोवाच — कल्पान्ते च गते त्वेवं जीवरूपा नु चेतसा। सर्वे ते प्रलयं यान्ति गङ्गेव हरमस्तके ॥ ३॥ कल्पे कल्पे प्रलीयन्ते यत्र यत्रापि देवताः। आत्मरूपे पञ्चलिङ्गे सर्वभूतात्मकेषु च ॥ ४॥ विश्वकर्मा ने कहा — कल्पान्त होने पर इस प्रकार समस्त जीव रूपी चैतन्य प्राणी प्रलय को प्राप्त हो जाते हैं जैसे शिव के मस्तक में गङ्गा समा गई थी। कल्प- कल्प में जहाँ कहीं भी देवता होते हैं, वे भी उसी प्रकार प्रलय में लुप्त हो जाते हैं तथा सभी भूतात्मकों में अर्थात् प्राणियों में सभी पाँच लिङ्गों की आत्मा-रूप में लीन हो जाते हैं। अविमुक्तं च केदारं ओङ्कारामरकण्टके। पञ्चमं श्रीमहाकालं कल्पान्ते लिङ्गंमव्ययम् ॥ ५॥ ततः काले समुद्भूता भरतक्षेत्रदेवताः। बदरीमथुरायोध्या योगेशं विश्वसम्भवः ॥ ६॥ पञ्चाक्षयानि कल्पान्ते हरिक्षेत्राणि वै विदुः। एषु भव्यकलाः सर्वा विष्णोश्चामोघमालिनी ॥ ७॥ पहला अविमुक्त, द्वितीय केदार, तृतीय ओङ्कारेश्वर, चतुर्थ अमरकण्टक और पञ्चम श्रीमहाकाल— ये पाँचों कल्पान्त में अव्यय लिङ्ग में समा जाते हैं। भरत क्षेत्र में उत्पन्न होने वाले देवता, बदरीनाथ, मथुराधीश, अयोध्यापति, योगेश, द्वारकाधीश और विश्वेश्वर विष्णु क्षेत्रों के पाँचों देवता कल्पान्त में क्षय को प्राप्त होते हैं, ऐसा सभी जानते हैं और इन सभी की पुनः उत्पन्न होने की कला भगवान् विष्णु की अमोघमाला वाली अर्थात् कभी व्यर्थ नहीं होने वाली है। केतुमालादि लिङ्गोद्भवक्षेत्राणि — भूर्भुवं भुवनेशं च भवोद्भवं तृतीयकम्। अट्टहासं तत्पुरुषं केतुमालं स्वयम्भुवम् ॥ ८॥

96 अपराजितपृच्छा (१.) भूर्भुव, (२.) भुवनेश, (३.) भवोद्भव, (४.) अट्टहास और (५.) तत्पुरुष— ये पाँचों यक्षलिङ्ग केतुमाल में उत्पन्न हुए। ईश्वरं शङ्करं श्रेयं श्रीकण्ठं व उग्रोहरम्। अक्षयपञ्चलिङ्गस्य इलावर्ते समुद्भवः ॥ ९ ॥ (१.) ईश्वर, (२.) शङ्कर, (३.) श्रेय, (४.) श्रीकण्ठ और (५.) उग्रोहर— ये पाँच अक्षय लिङ्ग इलावर्त में उत्पन्न हुए। पुष्करं पुष्कराख्यं च शङ्कुतेजं महाबलम् । गोकर्णं पञ्चमं लिङ्गं पुष्कराख्येऽक्षयोद्भवम् ॥ १० ॥ (१.) पुष्कर, (२.) पुष्कराख्य, (३.) शङ्कुतेज, (४.) महाबल और (५.) गोकर्ण— ये पाँच लिङ्ग अक्षय होकर पुष्कर नामक क्षेत्र में उत्पन्न हुए। सद्यं शान्तं महाकान्तं विश्वतेजो महोद्भवम् । पञ्चाक्षयानां लिङ्गानां पौरुषे स्यात्समुद्भवः ॥ ११ ॥ (१.) सद्य, (२.) शान्त, (३.) महाकान्त, (४.) विश्वतेज, (५.) महोद्भव— ये पाँचों लिङ्ग अक्षय पौरुष क्षेत्र में उद्भूत हुए। शङ्कुं शशाङ्कशम्भू च सिद्धेशं चन्द्रशेखरम् । पञ्चाक्षयानि लिङ्गानि शङ्कुक्षेत्राधिपानि च ॥ १२ ॥ (१.) शङ्कु, (२.) शशाङ्क, (३.) शम्भू (४.) सिद्धेश और (५.) चन्द्रशेखर— ये पाँचों अक्षय लिङ्ग शङ्कु क्षेत्र में उत्पन्न हुए। वामदेवं महादेवं कान्तं कमललोचनम् । अक्षयं कल्पजं लिङ्गं सागराक्षे ? त्पराजित ॥ १३ ॥ इसी प्रकार (१.) वामदेव, (२.) महादेव, (३.) कान्त कमललोचन (४.) अक्षय और (५.) कल्पज— ये पाँचों अक्षय लिङ्ग, हे अपराजित ! सागराक्ष क्षेत्र में उत्पन्न हुए। सद्योवामस्तथाधांरस्तत्पुरुष ईश एव च। अक्षये वक्त्रजा देवा रम्यके सृष्टिसम्भवे ॥ १४ ॥ इसके अतिरिक्त (१.) सद्योवाम, (२.) अघोर, (३.) तत्पुरुष, (४.) ईश और (५.) अक्षयवक्त्र— ये पाँचों अक्षय लिङ्ग रम्यक क्षेत्र में उत्पन्न हुए। लीयन्ते सर्वदेवाश्च कल्पान्ते लिङ्गमध्यगाः । कल्पान्ततोऽक्षयं लिङ्गं सागरे ? क्षेत्राधिपम् ॥ १५ ॥

सूत्र-२१ 97 कल्प के अन्त में लिङ्ग के मध्य में सभी देवता प्रलय में लीन हो जाते हैं। कल्प के अन्त होने के साथ ही सागर में अक्षय लिङ्ग उत्पन्न हो जाते हैं। द्वीपे द्वीपे पुनस्त्वेवं रुद्रलोकलिङ्गोद्भवम्। तेभ्यो जाता पुनः सृष्टिर्जगत्स्थावरजङ्गमम् ॥ 16 ॥ प्रत्येक द्वीप में पुनः इसी प्रकार रुद्रलोक के लिङ्गों का उद्भव हो जाता है जिनसे पुनः जगत में स्थावर-जङ्गम सृष्टि की उत्पत्ति होती है। सजलाम्भोधिसंसारे एकार्णवीभूतसंस्थितौ । विशीर्णानुमार्गख्यात तत्प्रवाहेन समुद्भवाः ? ॥ 17 ॥ प्रलयकाल में एकार्णवी भूत अर्थात् एक ही सागर में लीन हो चुकी समस्त सृष्टि इस सजलाम्भोधि संसार अर्थात् जल में डूबे हुए संसार के विशीर्ण होने के साथ-साथ ही उसके प्रवाह मार्ग से विख्यात होने वाले नए संसार की उत्पत्ति हो जाती है। वर्षाश्रयासमुद्राश्च सृष्टिकालसमुद्भवाः । प्रदक्षिणं स्थितास्त्वेवं मेरोश्च परिखार्णवाः ॥ 18

98 अपराजितपृच्छा उन्हीं से यह स्थावर-जङ्गम सृष्टि इस जगत में उत्पन्न हुई है, ऐसी ख्याती है। उन्हीं काश्यप से इस संसार की सृष्टि करने वाली शक्ति रूपा प्रकृति भी हुई, ऐसा विख्यात है। दैत्यासुरी च गन्धर्वी यक्षी विद्याधरी तथा। वैदेवी नागराजेन्द्री नरेन्द्री नाम चाष्टमी ॥ 22 ॥ उसी शक्ति से (1.) दैत्या, (2.) आसुरी, (3.) गन्धर्वी, (4.) यक्षी, (5.) विद्याधरी, (6.) वैदेवी, (7.) नागराजेन्द्री और (8.) नरेन्द्री मातृकाएँ उत्पन्न हुईं। दितेश्च देवाः सम्भूता असुर्य्याश्चासुरोद्भवः। गन्धर्वाजाश्च गन्धर्वी यक्ष्या यक्षसमुद्भवः ॥ 23 ॥ इनमें से दिति से देवता उत्पन्न हुए, आसुरी से असुर हुए, गन्धर्वों से गन्धर्व और यक्षी से यक्ष उत्पन्न हुए। विद्याधर्यास्तदभिधाः वैदेध्याश्चैव देवताः। विहगा नागराजेन्द्रा जाता नागेन्द्रकास्तथा ॥ 24 ॥ इसी प्रकार विद्याधरी से उत्पन्न विद्याधर नामधारी हुए। वैदेवी से देवता हुए, नागराजेन्द्री से समस्त पक्षीगण हुए और नाग, उरग सर्पादि भी हुए। नरेन्द्राश्च नरा विप्रक्षत्रविट्शूद्रसञ्ज्ञकाः। षट्त्रिंशच्च₃₆ कुलान्येवं प्रकृतीनामनेकधा ॥ 25 ॥ इसी तरह नरेन्द्री से सभी नर— विप्र, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र और मनुष्यों के छत्तीस प्रकार के कुल व प्रकृति के अनुसार उनके अनेक प्रकार के प्राणी हुए। इति सूत्रसन्तानगुणकीर्तिप्रकाशप्रोक्तश्रीभुवनदेवाचार्योक्तापराजितपृच्छायां अक्षयलिङ्गसृष्ट्युद्भवाधिकारो नामैकविंशं सूत्रम् ॥ 21 ॥ इस प्रकार भुवनदेवाचार्य कृत सूत्रसन्तानगुणकीर्ति प्रकाश या अपराजितपृच्छा में अक्षय लिङ्ग सृष्टि, उद्भव अधिकार नामक इक्कीसवाँ सूत्र पूर्ण हुआ ॥ 21 ॥ पञ्चलिङ्गोद्भवकाश्यपसृष्ट्युद्भवो नाम द्वाविंश सूत्रम् ॥ 22 ॥ अपराजित उवाच - कथं लिङ्गभवा सृष्टिः समस्ता सचराचरा। कथं ब्रह्मोद्भवा चैव कथयस्व प्रसादतः ॥ 1 ॥ ब्रह्माद्यप्रभवाः के चाक्षयलिङ्गोद्भवाश्च के। के च ज्योतिर्भवाश्चैव कथयस्व प्रसादतः ॥ 2 ॥