भारतकोश
अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)

अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)

Aparajitapriccha of Bhuvanadeva with Commentary by Shrikrishna Jugnu

भुवनदेवाचार्य (टीकाकार: डॉ. श्रीकृष्ण 'जुगनू') द्वारा

DevanagariHindipublished535 पृष्ठ

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82 अपराजितपृच्छा निमेषषोडशांशस्तु कला कलार्धं लम्बकः । लम्बकार्धे लम्बकाक्ष्यो लम्बकार्धे पादैस्त्रिभिः ? ॥ २४ ॥ निमेष के सोलहवें अंश को कला कहते हैं और आधी कला को लम्बक तथा लम्बक का आधा लम्ब और लम्ब का आधा पाद होता है। तीन पाद से ? उभौ करगृहीत अलम्बं त्रुटिशब्दतः ? । द्वे घट्यौ च मुहूर्तं स्यात् लग्नं पञ्चघटीभवम् ॥ २५ ॥ दोनों हाथों से अलम्ब त्रुटि शब्द से जाना जाता है ? दो घटी का मुहूर्त होता है और पाँच घटी का लग्न होता है।¹ सूर्यादि सप्तवाराश्च क्रमेण तिथयस्तथा । एवं प्रोक्तं मुहूर्तादि ह्यहोरात्रादिमध्यतः ॥ २६ ॥ क्रमयुक्तिर्विधातव्या कालसङ्ख्यामतः परम् । सूर्यादि से शुरू करते हुए सात (रविवार, सोम, मङ्गल, बुध, गुरु, शुक्र एवं शनि) वार होते हैं और एक के क्रम से (पन्द्रह तक) तिथियाँ होती हैं। इस प्रकार से दिन और रात के मध्य मुहूर्त आदि कहे गए हैं। ऐसा क्रम युक्ति से बनाना चाहिए। इसके परे काल संख्या को कहा जाएगा। इति सूत्रसन्तानगुणकीर्तिप्रकाशप्रोक्तश्रीभुवनदेवाचार्योक्ता०-जितपृच्छां ग्रहगतिमान मुहूर्तादिप्रमाणनिर्णयाधिकारेऽष्टादश सूत्रम् ॥ १८ ॥ इस प्रकार भुवनदेवाचार्य कृत सूत्रसन्तानगुणकीर्ति प्रकाश या अपराजितपृच्छा में ग्रहगतिमान मुहूर्तादि प्रमाण निर्णय अधिकार नामक अठारहवाँ सूत्र पूर्ण हुआ ॥ १८ ॥ तिथिमासर्तुकालसंवत्सरो नामैकोनविंशं सूत्रम् ॥ १९॥ अपराजित उवाच - कालसङ्ख्या कथं देव ह्यष्टयामादिकं तथा । तिथिसंवत्सराद्यं च कथयस्व प्रसादतः ॥ १ ॥ संवत्सराभिधानानि पृथक् चैवं प्रमाणतः ।

  1. विष्णुपुराण में 15 निमेष की 1 काष्ठा तथा 30 काष्ठा की 1 कला और 30 कला का 1 मुहूर्त कहा गया है, 30 मुहूर्त का 1 दिन एवं रात्रि बताई गई है और 30 अहोरात्र का एक मास कहा है- काष्ठापञ्चदशाख्याता निमेषा मुनिसत्तम। काष्ठा त्रिंशत्कला तास्ता त्रिंशन्मौहूर्तिको विधिः ॥ तावत्संख्यैरहोरात्रं मुहूर्तैर्मानुषं स्मृतम्। अहोरात्राणि तावन्ति मासः पक्षद्वयात्मकः ॥ तैः षड्भिरयनं वर्षं द्वेऽयने दक्षिणोत्तरे। अयनं दक्षिणं रात्रिर्देवानामुत्तरं दिनम्॥ (अंश 1, 3, 8-10)