भारतकोश
अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)

अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)

Aparajitapriccha of Bhuvanadeva with Commentary by Shrikrishna Jugnu

भुवनदेवाचार्य (टीकाकार: डॉ. श्रीकृष्ण 'जुगनू') द्वारा

DevanagariHindipublished535 पृष्ठ

पृष्ठ 130, कुल 535 में से

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सूत्र-१८ 81 तदूर्ध्वं च षड्‌विंशत्या त्वेकत्रिंशत् सदा क्रमः। चतुर्विंशतिरूपर्ध्वे तु दशपञ्च तथोत्तरे ॥ 17 ॥ इससे ऊपर छब्बीस से लेकर इकतीस तक के सदाक्रम में, चौबीस से ऊपर पन्द्रह, इस प्रकार कुल उनतालीस उत्तर में भी होते हैं। अग्रे गतिश्च दशभिः पञ्चभिर्मध्यमाश्रिते। त्रिभिः सहस्रैर्मध्याह्ने योजनैर्गतिमादिशेत् ॥ 18 ॥ इसके आगे की गति दस और पाँच के मध्य आश्रित रहती है। तीन हजार योजन की गति मध्याह्न तक (आदिशेत्) कही गई है। पूर्वाह्ने च गतिं ज्ञात्वा विपरीता परेऽहनि। एवं क्रमैः युक्तियोगो ग्रहाणां च गतिस्तथा ॥ 19 ॥ पूर्वाह्न की गति जानने पर उससे विपरीत करके अपराह्न की गति लानी चाहिए। इस क्रम से युक्तियोग और ग्रहों की गति लाई जाती है। भुक्तिमानं गतिश्चैवं सूर्यादिग्रहमण्डले। प्रयुक्तश्च ध्रुवो मध्ये भ्रमते दक्षिणावृतम् ॥ 20 ॥ सूर्यादि ग्रह मण्डल में जितनी गति भुक्तिमान हुई है, उसे प्रयुक्त करके वे ध्रुव के मध्य में दक्षिणावृत्त में भ्रमण करते हैं। प्रदक्षिणीकृते तस्मिनहोरात्रमितिस्मृतम्। प्रदक्षिणार्द्धमावृत्ते दृष्टे सूर्ये तथा दिवि ॥ 21 ॥ तथा रात्रिरथाख्याता सूर्ये चादृष्टतां गते। तस्यैव षष्टिकांशस्तु₆₀ प्रोच्यते घटिकाभिधा ॥ 22 ॥ इस प्रकार के प्रदक्षिणा करने से इससे अहोरात्र अर्थात दिन-रात की संज्ञा से स्मरण किया जाता है। प्रदक्षिणा की अर्ध आवृत्ति में जब तक सूर्य दिखाई देता है, तब तक दिन कहा जाता है तथा सूर्य के अदृष्ट हो जाने पर (प्रदक्षिणा की दूसरी अर्ध आवृत्ति को) रात्रि कहा जाता है। इसी दिन और रात का साठवाँ अंश घटिका के नाम से जाना जाता है। ताभिर्दिनं षष्टिभिश्च मासस्त्रिंशद्दिनैर्भवेत्। घटिकाषष्टिपलैर्निमेषः पञ्चदशपलैः ॥ 23 ॥ ऐसी साठ-साठ घटियों के योग से बनने वाले तीस दिनों का मास बनता है और घटिका साठ पल की तथा निमेष पन्द्रह पल का होता है।

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