भारतकोश
अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)

अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)

Aparajitapriccha of Bhuvanadeva with Commentary by Shrikrishna Jugnu

भुवनदेवाचार्य (टीकाकार: डॉ. श्रीकृष्ण 'जुगनू') द्वारा

DevanagariHindipublished535 पृष्ठ

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80 अपराजितपृच्छा केतोश्च भौमतुल्यं स्यात् कथितं च प्रमाणतः ॥ 10 ॥ इसके अतिरिक्त राहु मण्डल का प्रमाण आठ हजार योजन का है तथा केतु का बिम्बमान मङ्गल के तुल्य अर्थात् बीस योजन का है। यह मैंने प्रमाणतः कहा है। ध्रुवस्य प्रदक्षिणागतिक्रमाह — गतिक्रमं च वक्ष्याति ध्रुवमेकं प्रदक्षिणम्। योजनैश्च गतिस्त्वेवं गम्यते च प्रदक्षिणम् ॥ 11 ॥ अब मैं ध्रुव की एक प्रदक्षिणा के गतिक्रम तथा प्रदक्षिणा में जाते समय की उनकी योजनों में होने वाली गति के बारे में कहता हूँ। निमिषे द्विशतं भानुः ग्लौः सार्धद्विसहस्रकम्। त्रयस्त्रिंशदधिकशतयोजनैर्भौमगतिः ॥ 12 ॥ बुधश्च सूर्यमानेन भ्रमति ध्रुवदक्षिणम्। गुरुश्च क्रमते चैव योजनैर्दशपञ्चभिः ॥ 13 ॥ शुक्रसूर्यगतिश्चैव द्विशतं निमिषान्तरे। समयोजनत्रिभागं निमिषात्तु शनैश्चरः ॥ 14 ॥ योजनरकादशभी राहोश्च निमिषे गातः। केतुर्भानोः समन्ताच्च भ्रमते दक्षिणावृतम् ॥ 15 ॥ निमिष में सूर्य की गति दो सौ योजन और ग्लौ (चन्द्रमा) की एक निमिष में ढाई हजार योजन गति होती है। एक निमिष में ही मङ्गल की गति एक सौ तैतीस योजन की होती है। बुध की गति सूर्य के मान के बराबर एक निमिष में दो सौ योजन होती है जो ध्रुव के दक्षिण में भ्रमण करता है। गुरु की भ्रमण गति भी एक निमिष में पन्द्रह योजन की होती है। शुक्र की भी सूर्य की गति के समान ही एक निमिष में दो सौ योजन की होती है तथा शनि की गति एक निमिष में पौने आठ योजन की होती है। इसी प्रकार राहु की गति एक निमिष में ग्यारह योजन और केतु का गतिमान भी राहु के समान ही ग्यारह योजन प्रति निमिष होता है जो दक्षिणावृत्त में भ्रमण करता है। आमध्याह्नमुदयतो ह्यष्टधा च दिनार्धकम्। चत्वारिंशत्त्वेकहीनं सहस्राण्याद्यसङ्क्रमे ॥ 16 ॥ सूर्योदय से मध्याह्न तक अष्टधा अर्थात् दिनार्द्ध होता है। इस अवधि से चालीस से एक कम अर्थात् उनतालीस हजार संक्रमण सूर्योदय से मध्याह्न तक होते हैं।