भारतकोश
अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)

अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)

Aparajitapriccha of Bhuvanadeva with Commentary by Shrikrishna Jugnu

भुवनदेवाचार्य (टीकाकार: डॉ. श्रीकृष्ण 'जुगनू') द्वारा

DevanagariHindipublished535 पृष्ठ

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सूत्र-२० सहस्राण्यष्टाविंशतिर्लक्षाणि दशसप्त च। प्रमाणं कृतयुगस्य दैवज्ञैश्च प्रभाषितम् ॥ ६ ॥ (किन्तु) दैवज्ञों ने 17, 28, 000 की वर्ष संख्या को भी कृतयुग की वर्ष संख्या माना है।¹ तस्य पादत्रयं त्रेता द्वापरं तत्पदद्वयम्। पादमेकं कलियुगं प्रमाणमुदितं त्विदम् ॥ ७ ॥ उक्त संख्या के तीन पाद (अर्थात् 17, 28, 000 × 3/4 = 12, 96, 000 वर्ष) त्रेतायुग की, इसके दो पाद के बराबर अर्थात् (17, 28, 000 × 1/2 = 8, 64, 000 वर्ष) द्वापर की तथा इसके एक पाद के बराबर अर्थात् (17, 28, 000 × 1/4 = 4, 32, 000 वर्ष) कलियुग का वर्ष संख्या का प्रमाण कहा है।² तथा युगचतुष्कं च चतुर्भिश्च युगैर्भवेत्। चतुष्कस्य प्रमाणं च कथयामि यथाक्रमम् ॥ ८ ॥ इस प्रकार इन चारों की वर्ष संख्या को जोड़ने पर युगचतुष्क बनता है जिसकी प्रामाणिक वर्ष संख्या मैं यथाक्रम से कहता हूँ। त्रिचत्वारिंशल्लक्षाणि सहस्राणां च विंशतिः। चतुष्कस्य प्रमाणं च सृष्टिकालसमुद्भवम् ॥ ९ ॥ १. युगादि के कालमान को लेकर कई मत है, उक्त गणना सिद्धान्तशिरोमणि के अनुसार हैं जबकि विष्णुपुराणकार ने माना है कि पुराविदों ने सतयुग आदि का परिमाण क्रमशः चार, तीन, दो एवं एक हजार दिव्य वर्ष बतलाया है। प्रत्येक युग के पूर्व उतने ही सौ वर्ष की सन्ध्या बताई जाती है और युग के पीछे उतने ही परिमाणवाले सन्ध्यांश होते हैं। इन सन्ध्याओं व सन्ध्यांशों के बीच का जितना काल होता है, उसे ही कृतादि नाम वाले युग जाने - दिव्याब्दानां सहस्राणि युगेष्वाहुः पुराविदः ॥ तत्प्रमाणैः शतैः सन्ध्या पूर्वा तत्राभिधीयते। सन्ध्यांशश्चैव तत्तुल्यो युगस्यानन्तरो हि सः ॥ सन्ध्यासन्ध्यांशयोरन्तर्यः कालो मुनिसत्तम। युगाख्यः स तु विज्ञेयः कृतत्रेतादिसञ्ज्ञितः ॥ (विष्णुपुराण 1, 3, 12-14) उक्त श्लोक ब्रह्मगुप्त के मत से तुलनीय है। ब्राह्मस्फुटसिद्धान्त में आया है - प्राणैर्विनाडिकार्क्षी षड्भिर्घटिका विनाडिका षष्ट्या । घटिका षष्ट्या दिवसो दिवसानां त्रिंशता मासाः ॥ मासा द्वादशवर्षं विकलालिसांशराशिभगणान्तः । क्षेत्रविभागस्तुल्यः कालेन विनाडिकाद्येन ॥ स्वचतुष्टयरदवेदा रविवर्षाणां चतुर्युगं भवति। 4320000 सन्ध्या सन्ध्यांशै सह चत्वारि पृथकृतादीनि ॥ युगदशभागो गुणितः कृतं चतुर्भिस्त्रिर्गुणस्त्रेता। द्विगुणो द्वापरमेकेन सङ्गुणः कलियुगं भवति ॥ (ब्राह्मस्फुट. पूर्वाद्शाध्याय्यां, मध्यम., 5-8) २. भोजराज का मत है कि उनको चार से गुणा किया जाए तो कृतयुग का प्रमाण होगा, तीन से गुणा करने पर त्रेता, दो से गुणा करने पर द्वापर और एक से गुणा करने पर कलियुग होगा : तद्दशगुणितं कृतं चतुर्भिस्त्रिभिस्त्रेता । द्विगुणो द्वापरं एवं कलिरेकगुणः समाख्यातः ॥ (राजमार्तण्ड 1440)