भारतकोश
अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)

अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)

Aparajitapriccha of Bhuvanadeva with Commentary by Shrikrishna Jugnu

भुवनदेवाचार्य (टीकाकार: डॉ. श्रीकृष्ण 'जुगनू') द्वारा

DevanagariHindipublished535 पृष्ठ

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88 अपराजितपृच्छा बताकर युग चतुष्टय— कृतयुग, त्रेता, द्वापर और कलियुग कहे गए हैं। इति सूत्रसन्तानगुणकीर्तिप्रकाशप्रोक्तश्रीभुवनदेवाचार्योक्तापराजितपृच्छायां तिथिमासर्तुकालसंवत्सराद्यधिकार एकोनविंशं सूत्रम् ॥ 19 ॥ इस प्रकार भुवनदेवाचार्य कृत सूत्रसन्तानगुणकीर्ति प्रकाश या अपराजितपृच्छा में तिथि, मास, ऋतुकाल, संवत्सरादि अधिकार नामक उन्नीसवाँ सूत्र पूर्ण हुआ ॥ 19 ॥ कल्पान्तो नाम विंशं सूत्रम् ॥ 20 ॥ अपराजित उवाच — संवत्सरास्तु कथिता मन्मनोभ्रान्तिहारकाः । युगानां तु प्रमाणं च कथयस्व परेश्वर ॥ 1 ॥ मन्वन्तरप्रमाणं किम् कथं युगचतुष्टयम् । कल्पान्तं च कथं देव प्रसादं कुरु मे प्रभो ॥ 2 ॥ अपराजित बोले— हे परमेश्वर ! आपने संवत्सरों के बारे में कहकर मेरे मन की भ्रान्ति का निवारण कर दिया है। अब कृपा करके युगों के प्रमाण कहिए। मन्वन्तरों का क्या प्रमाण है, चारों युगों का प्रमाण क्या है, कल्पान्त किसे कहते हैं। हे प्रभु! कृपा करके मुझे कहिए। विश्वकर्मोवाच — अतस्तात प्रवक्ष्यामि प्रमाणं तु युगोद्भवम् । चतुर्दशमन्वन्तरैः कल्पमेकं तु सङ्ख्यया ॥ 3 ॥ येन सङ्ख्याप्रमाणं च वत्सरादि प्रवर्तते । अनुक्रमेण वक्ष्यामि यथा प्रोक्तं पृथग्विधम् ॥ 4 ॥ विश्वकर्मा ने कहा — हे प्रिय ! अब मैं तुम्हें युगोद्भव के प्रमाण के बारे में कहता हूँ। पहले यह समझ लो कि चौदह मन्वन्तरों की संख्या से एक कल्प होता है। जिन संख्या प्रमाणों से इनके वर्ष आदि होते हैं, उनके विषय में भी मैं यहाँ अनुक्रम से कहता हूँ। युग प्रमाणमाह — अष्टाविंशतिसहस्त्राण्यग्रे चाष्टशतानि च। संवत्सरैश्च गुणयेत् कृतसङ्ख्याप्रमाणतः ॥ 5 ॥ एक गणना के अनुसार 28 हजार को 8 सौ से गुणित करने पर (22, 40000) कृतयुग अर्थात् सत्ययुग की वर्ष प्रमाण संख्या होती है।