भारतकोश
अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)

अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)

Aparajitapriccha of Bhuvanadeva with Commentary by Shrikrishna Jugnu

भुवनदेवाचार्य (टीकाकार: डॉ. श्रीकृष्ण 'जुगनू') द्वारा

DevanagariHindipublished535 पृष्ठ

पृष्ठ 136, कुल 535 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 136

सूत्र-१९ ८१ कीलक, (43.) सौम्य, (44.) साधारण, (45.) विरोधकृत, (46.) परिधावी, (47.) प्रमादी, (48.) आनन्द, (49.) राक्षस, (50.) नल, (51.) पिङ्गल, (52.) कालयुक्त, (53.) सिद्धार्थ, (54.) रौद्र, (55.) दुर्मती, (56.) दुन्दुभि, (57.) रुधिरोद्गारी, (58.) रक्ताक्ष, (59.) क्रोधन तथा (60.) क्षय— ये साठ संवत्सर के नाम कहे गए हैं।¹ एतद्विंशत्यानि — ब्रह्मसृष्टिर्विंशतिश्च प्रभवादि व्ययान्तगा ॥ २९ ॥ विष्णोः सर्वजिदाद्याश्च विंशतिश्चापराभवम् । प्लवङ्गादि क्षयान्त च तथास्याद्रुद्रविंशतिः ॥ ३० ॥ गुणा यथाभिधानं च शस्ताशस्ते विदुर्बुधाः । (इनमें से बीस-बीस संवत्सर क्रमशः ब्रह्म, विष्णु व रुद्रबीसी संज्ञक है) प्रभव से लेकर व्यय तक के बीस संवत्सरों को ब्रह्मसृष्टिर्विंशति या ब्रह्म-बीसी कहा जाता है। सर्वजित से पराभव तक बीस संवत्सरों को विष्णुसृष्टिर्विंशति या विष्णु- बीसी और प्लवङ्ग से क्षय संवत्सर तक की गणना रुद्रसृष्टिर्विंशति या रुद्र-बीसी के अन्तर्गत होती है। इन संवत्सरों के जैसे नाम हैं, वैसे ही इनके प्रशस्त-अप्रशस्त गुण भी होते हैं, ऐसा विद्वान जानते हैं। युगमानं च कल्पान्तमथ मन्वन्तरं तथा । दिनसङ्ख्या प्रमाणेन तथा युगचतुष्टयम् ॥ ३१ ॥ कल्पान्त से आरम्भ करके मन्वन्तर तक की दिन संख्या को युगमान प्रमाण


१. तथा च ज्योतिषरत्नमालायां— प्रभवविभवाख्यशुक्लाः प्रमोदनामा प्रजापतिरथाब्दः। परतोऽङ्गिरास्ततश्च श्रीमुखभावौ युवाख्योऽन्यु॥ धातेश्वरव्यहुधान्यौ प्रमाथिनामाथ विक्रमाख्यातः। सवृषोऽथ चित्रभानुस्मात्सुभानुरथ तारणाख्यश्च॥ पार्थिवनामाव्यय इति सर्वजिदाख्यो सर्वधारी च। तदनु विरोधी विकृतः खरनन्दनजयविजयसञ्ज्ञाः॥ मन्मथदुर्मुखसञ्ज्ञावथापरौ हेमलम्बकविलम्बौ। तद्वद्विकारिनामाथ शर्वरी प्लव इति च शुभकृच्च॥ शोभनकृदथ परः क्रोधीविश्वावसुस्तनुपराभवाख्यश्च। परतः प्लवङ्गनामाकीलक इति सौम्यसञ्ज्ञश्च॥ साधारणो विरोधकृदथपरिधा विप्रमादिनामानौ। आनन्दराक्षसाख्यौ नलपिङ्गलकालयुक्ताश्च॥ सिद्धार्थरौद्रदुर्मति दुन्दुभयोवत्सराः क्रमादपरे। रुधिरोद्गारीरक्ताक्ष सञ्ज्ञकः क्रोधनः क्षयकृत्॥ (ज्योतिषरत्नमाला 1, 4-10) श्रीपति का मत है कि गुरु के मध्यम गति से एक राशि के भोग समय को वत्सर माना गया है अर्थात् गुरु अपनी मध्यम गति से चलता हुआ एक राशि का जब तक उपभोग करता है, उतने समय तक एक प्रभवादि संवत् का समय होता है। गुरु के मान से ही प्रभवादि साठ वर्षों की गणना प्रवृत्ति को स्वीकारा गया है— इयं हि षष्टिःपरिवत्सराणां बृहस्पतेर्मध्यमराशिभोगात्। उदाहता पूर्वमुनिप्रवर्यैर्नियोजनीया गणना क्रमेण॥ (तत्रैव 1, 11)