अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)
Aparajitapriccha of Bhuvanadeva with Commentary by Shrikrishna Jugnu
भुवनदेवाचार्य (टीकाकार: डॉ. श्रीकृष्ण 'जुगनू') द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंतियालीस लाख बीस हजार वर्ष संख्या का प्रमाण अर्थात् (43, 20, 000 वर्ष) सृष्टि के आरम्भ काल से एक चतुर्युग या एक युगचतुष्क पूरा होने तक समझें। द्वासप्ततिचतुष्काणि मनुश्चैव प्रवर्तते। कालसङ्ख्या मनोः प्रोक्ताः पृथक् सङ्ख्या चतुर्दश₁₄ ॥ 10 ॥ ऐसी बहत्तर (अन्य ज्योतिषीय गणनानुसार 71)¹ चतुर्युगियों में 14 मनु की स्थिति है जिनकी यह काल संख्या चौदह मनुओं की है। संभूक्षे तलाभिधानं च प्रारमुनिस्तृतीयकम ? । सङ्कल्पभाव सांतश्च सावर्णिकस्यानु सप्तमम् ? ॥ 11 ॥ समनु प्लवसौम्याश्च आह्लादश्च सूर्यात्मकः। त्रिदशाक्ष पूर्णस्य तु सप्तभि र्न चतुर्दश ? ॥ 12 ॥ (दोनों श्लोकों का पाठ भ्रष्ट होने से विष्णु व मार्कण्डेय पुराणों के प्रमाणानुसार) चौदह मनुओं के नाम इस प्रकार हैं- (1.) स्वायम्भुव, (2.) स्वारोचिष, (3.) उत्तम, (4.) तामस, (5.) रैवत और (6.) चाक्षुष। वर्तमान मन्वन्तर (7.) वैवस्वत है जबकि भविष्य के मनु हैं- (8.) सावर्णि, (9.) दक्षसावर्णि, (10.) ब्रह्मसावर्णि, (11.) धर्मसावर्णि, (12.) रुद्रसावर्णि, (13.) रुचिसावर्णि और (14.) भौमसावर्णि ²
- पौराणिक गणनाओं में कृतादि चतुर्युगों के एक हजार चतुर्युग का ब्रह्मा का एक दिन होता है। इस एक दिन में चौदह मनु होते हैं। सप्तर्षि, देवगण, इन्द्र, मनु और मनु के पुत्र राजा लोग एक ही काल में रचे जाते हैं और एक ही काल में उनका संहार होता है। इकहत्तर चतुर्युग से कुछ अधिक काल का एक मन्वन्तर होता है। इकहत्तर चतुर्युग की गणना से चौदह मन्वन्तरों में 994 चतुर्युग होते हैं और ब्रह्मा के एक दिन में एक हजार चतुर्युग होते हैं, अतः छह चतुर्युग शेष रहते हैं। छह चतुर्युग का चौदहवाँ भाग कुछ कम पाँच हजार एक सौ तीन दिव्य वर्ष होता है, इस प्रकार से एक मन्वन्तर में इकहत्तर चतुर्युग के अलावा इतने दिव्य वर्ष और अधिक होते हैं। विष्णुपुराण में आया है- कृतं त्रेता द्वापरश्च कलिश्चैव चतुर्युगम् ।.. सप्तर्षयः सुराः शक्रो मनुस्तत्सूनवो नृपाः। एककाले हि सृज्यन्ते संह्रियन्ते च पूर्ववत् ॥ चतुर्युगाणां सङ्ख्याता साधिका ह्येकसप्ततिः। मन्वन्तरं मनोः कालः सुरादीनां च सत्तम ॥ (विष्णुपुराण 1, 3 15 एवं 17-18)
- विष्णुपुराण (1, 3, 1-2 एवं 6, 3, 6-11); मार्कण्डेयपुराण (53वें अध्याय) में भौम का नाम भौत्य भी आया है और अन्यत्र इसका नाम इन्द्रसावर्णि भी मिलता है। इस सम्बन्ध में सामान्यतया गणनाएँ इस प्रकार की गई है- मानव का 1 मास = पितृ का एक दिन-रात। मनुष्य का एक वर्ष = देवता का 1 दिन-रात। मनुष्य के तीन वर्ष = देवता का 1 मास। मनुष्य के 360 वर्ष = देवता का एक दिव्य वर्ष। 432000 मानव वर्ष = 1200 दिव्य वर्ष = 1 कलियुग। 864000 मानव वर्ष = 2400 दिव्य वर्ष = 1 द्वापर। 1296000 मानव वर्ष = 3600 दिव्य वर्ष = 1 त्रेतायुग। 1728000 मानव वर्ष = 4800 दिव्य वर्ष