भारतकोश
अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)

अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)

Aparajitapriccha of Bhuvanadeva with Commentary by Shrikrishna Jugnu

भुवनदेवाचार्य (टीकाकार: डॉ. श्रीकृष्ण 'जुगनू') द्वारा

DevanagariHindipublished535 पृष्ठ

पृष्ठ 140, कुल 535 में से

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सूत्र-२० 91 मनुभिश्चतुर्दशभिः कल्पसङ्ख्या प्रमाणतः । एवमुक्तं च कल्पान्तं पुनरेवं समुद्भवः ॥ 13 ॥ इन चौदह मनुओं की कुल वर्ष संख्या को एक कल्प की संख्या का प्रमाण कहा है। इस प्रकार कहे गए कल्प के अन्त में यह सृष्टि पुनः उत्पन्न होती है। अपराजित उवाच – कल्पान्तश्च कथं तात कैश्चिह्नैरुपलक्षितः । देवेशाहं न जानामि कल्पान्ते सृष्टिच्छन्दकम् ॥ 14 ॥ अपराजित ने पूछा कि हे तात ! कल्पान्त के समय क्या-क्या चिह्न उपस्थित होते हैं ? हे देवेश ! कल्पान्त के बाद सृष्टि का कैसा छन्द होगा, कैसी रचना होगी, यह मैं नहीं जान पाता हूँ। विश्वकर्मोवाच – कल्पान्तो प्राप्यते वत्स ह्युल्कापातैरनेकशः । तस्य चिह्नानि रूपाणि कथयामि समासतः ॥ 15 ॥ विश्वकर्मा बोले – कल्पान्त आने पर अनेकशः उल्कापात होते हैं, उनके चिह्न और रूप मैं संक्षेप में कहता हूँ। कल्पान्तचिह्नादीनामाह – उल्कापाताद् वज्रघातादन्नाभावाज्जनात्ययः । सादित्ये च विनामेघैर्वज्रविद्युत्पातोद्भवः ॥ 16 ॥ अब्दान्ते भूमिकम्पश्च ह्याब्दार्धे तु पुनः पुनः । पांशुवृष्टिश्च पतति सादित्ये रजनी यथा ॥ 17 ॥ उल्कापात से, वज्राघात से अर्थात् बिजली गिरने से, अन्न के अभाव में प्रजा दुखी हो जाती है। सूर्य का आतप असहनीय हो जाता है और बिना मेघों के भी = 1 कृत युग। इन सबको मिलाकर योग 43, 20, 000 मानव वर्ष = 12000 दिव्य वर्ष = 1 महायुग या चतुर्युगी। इस प्रकार एक चतुर्युगी में 12000 दिव्य वर्ष या 43 लाख 20 हजार मानव वर्ष होते हैं और इसी को महायुग कहा जाता है। यह भी स्पष्ट है कि प्रत्येक युग में सन्ध्या, मुख्यभाग और सन्ध्यांश नाम से तीन-तीन गणनाएँ होती हैं। यह गणना इस प्रकार होती है। जैसे— कृतयुग में सन्ध्या 400 वर्ष, मुख्यभाग 4000 तथा सन्ध्यांश 400 वर्ष का है। त्रेतायुग में सन्ध्या 300 मुख्यभाग 3000 तथा सन्ध्यांश 300, द्वापर में सन्ध्या 200, मुख्यभाग 2000 तथा सन्ध्यांश 200 और कलिकाल में सन्ध्या 100 मुख्यभाग 1000 तथा सन्ध्यांश 100 वर्ष का होता है। प्रो. ह्विटने का कथन है कि 12000 वर्षों को देववर्ष मानने की कल्पना मनु की नहीं है, बहुत बाद की है। (सूर्यसिद्धान्त : जे. बर्गेस द्वारा अनूदित पृष्ठ 10)

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