अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)
Aparajitapriccha of Bhuvanadeva with Commentary by Shrikrishna Jugnu
भुवनदेवाचार्य (टीकाकार: डॉ. श्रीकृष्ण 'जुगनू') द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें94 अपराजितपृच्छा एवं जाते तदाकाले विष्णौ क्षीरोदसंस्थिते। क्षीरोदस्थितविष्णोश्च शेषपर्यङ्कशायिनः ॥ ३२ ॥ नाभेर्ब्रह्मा समुत्पन्नः पद्मयोनिश्च सृष्टिकृत्। ततः सर्वं समुत्पन्नं जगत्स्थावरजङ्गमम् ॥ ३३ ॥ ऐसे हो जाने पर तब क्षीरसागर में शेषनाग के पर्यङ्क पर सोने वाले विष्णु की नाभि से निकलने वाले कमल नाल से पद्मयोनि से जन्म लेने वाले ब्रह्मा पुनः सृष्टि की रचना करते हैं जिससे सभी स्थावर, जङ्गम जीवों की उत्पत्ति होती है। योऽसौ क्षीरोदमध्ये तु सप्तलोकजलाम्बुधौ। शेषे च नागपर्यङ्के शेषस्याहेश्च तद्विधिः ? ॥ ३४ ॥ ............. फणिमणिकिरणैर्व्यज्यते श्वासवातैः। ............. ऋषिमुनिगणैर्ऋग्यजुः साममन्त्रैः। ............. स्तूयमानो ............ ब्रह्मादि देवैः। विष्णुस्त्रैलोक्यनाथः कलिकलुषहरः पातु वैः पद्मनाभः ॥ ३५ ॥ इस प्रकार ये सभी जीव क्षीर समुद्र में सप्तलोक में व्याप्त जलाम्बुधि अर्थात् सागर में शेषशय्या के नाग पर्यङ्क पर सोये हुए विष्णु भगवान् कलि-कलुष के हरने वाले प्रभु की सर्प तो अपने फणों मणियों से श्वासाघात से पँखा करके और ऋषि मुनिगण ऋक्, यजु और साम मन्त्रों से तथा ब्रह्मादि देवतागण उनकी स्तुतिगान करके, उन पद्मनाभ भगवान विष्णु से रक्षा की प्रार्थना करते हैं। इति सूत्रसन्तानगुणकीर्तिप्रकाशप्रोक्तश्रीभुवनदेवाचार्योक्तापराजितपृच्छायां कल्पान्ताधिकारो नाम विंशं सूत्रम् ॥ २० ॥ इस प्रकार भुवनदेवाचार्य कृत सूत्रसन्तानगुणकीर्ति प्रकाश या अपराजितपृच्छा में कल्पान्त अधिकार नामक बीसवाँ सूत्र पूर्ण हुआ ॥ २० ॥ अक्षयलिङ्गसृष्ट्युद्भवो नामैकविंशं सूत्रम् ॥ २१ ॥ अपराजित उवाच - पूर्वसृष्ट्युद्भवो यद्वत्तथा तन्नाम देवता। अन्यथा वा भवेदिन्द्रस्तथा च त्रिदशोद्भवः ॥ १ ॥ उपस्थिते च कल्पान्ते किं पुनः सृष्टिरुद्भवेत्। पूर्वाभिधानयुक्ता चान्यथा वा कथय प्रभो ॥ २ ॥