भारतकोश
अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)

अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)

Aparajitapriccha of Bhuvanadeva with Commentary by Shrikrishna Jugnu

भुवनदेवाचार्य (टीकाकार: डॉ. श्रीकृष्ण 'जुगनू') द्वारा

DevanagariHindipublished535 पृष्ठ

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सूत्र-२१ 95 अपराजित बोले — पूर्व में जिस प्रकार से सृष्टि उत्पन्न हुई और उसके नाम के जो-जो देवता हुए, क्या उनसे अन्यथा अर्थात् अन्य प्रकार के इन्द्र और देवता, कल्पान्त के उपस्थित होने पर पुनः उत्पन्न होते हैं? हे प्रभु! क्या वे पहले का नाम, धाम वाले ही होते हैं या अन्य प्रकार के होते हैं, यह सब आप कहिए। विश्वकर्मोवाच — कल्पान्ते च गते त्वेवं जीवरूपा नु चेतसा। सर्वे ते प्रलयं यान्ति गङ्गेव हरमस्तके ॥ ३॥ कल्पे कल्पे प्रलीयन्ते यत्र यत्रापि देवताः। आत्मरूपे पञ्चलिङ्गे सर्वभूतात्मकेषु च ॥ ४॥ विश्वकर्मा ने कहा — कल्पान्त होने पर इस प्रकार समस्त जीव रूपी चैतन्य प्राणी प्रलय को प्राप्त हो जाते हैं जैसे शिव के मस्तक में गङ्गा समा गई थी। कल्प- कल्प में जहाँ कहीं भी देवता होते हैं, वे भी उसी प्रकार प्रलय में लुप्त हो जाते हैं तथा सभी भूतात्मकों में अर्थात् प्राणियों में सभी पाँच लिङ्गों की आत्मा-रूप में लीन हो जाते हैं। अविमुक्तं च केदारं ओङ्कारामरकण्टके। पञ्चमं श्रीमहाकालं कल्पान्ते लिङ्गंमव्ययम् ॥ ५॥ ततः काले समुद्भूता भरतक्षेत्रदेवताः। बदरीमथुरायोध्या योगेशं विश्वसम्भवः ॥ ६॥ पञ्चाक्षयानि कल्पान्ते हरिक्षेत्राणि वै विदुः। एषु भव्यकलाः सर्वा विष्णोश्चामोघमालिनी ॥ ७॥ पहला अविमुक्त, द्वितीय केदार, तृतीय ओङ्कारेश्वर, चतुर्थ अमरकण्टक और पञ्चम श्रीमहाकाल— ये पाँचों कल्पान्त में अव्यय लिङ्ग में समा जाते हैं। भरत क्षेत्र में उत्पन्न होने वाले देवता, बदरीनाथ, मथुराधीश, अयोध्यापति, योगेश, द्वारकाधीश और विश्वेश्वर विष्णु क्षेत्रों के पाँचों देवता कल्पान्त में क्षय को प्राप्त होते हैं, ऐसा सभी जानते हैं और इन सभी की पुनः उत्पन्न होने की कला भगवान् विष्णु की अमोघमाला वाली अर्थात् कभी व्यर्थ नहीं होने वाली है। केतुमालादि लिङ्गोद्भवक्षेत्राणि — भूर्भुवं भुवनेशं च भवोद्भवं तृतीयकम्। अट्टहासं तत्पुरुषं केतुमालं स्वयम्भुवम् ॥ ८॥