भारतकोश
अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)

अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)

Aparajitapriccha of Bhuvanadeva with Commentary by Shrikrishna Jugnu

भुवनदेवाचार्य (टीकाकार: डॉ. श्रीकृष्ण 'जुगनू') द्वारा

DevanagariHindipublished535 पृष्ठ

पृष्ठ 145, कुल 535 में से

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96 अपराजितपृच्छा (१.) भूर्भुव, (२.) भुवनेश, (३.) भवोद्भव, (४.) अट्टहास और (५.) तत्पुरुष— ये पाँचों यक्षलिङ्ग केतुमाल में उत्पन्न हुए। ईश्वरं शङ्करं श्रेयं श्रीकण्ठं व उग्रोहरम्। अक्षयपञ्चलिङ्गस्य इलावर्ते समुद्भवः ॥ ९ ॥ (१.) ईश्वर, (२.) शङ्कर, (३.) श्रेय, (४.) श्रीकण्ठ और (५.) उग्रोहर— ये पाँच अक्षय लिङ्ग इलावर्त में उत्पन्न हुए। पुष्करं पुष्कराख्यं च शङ्कुतेजं महाबलम् । गोकर्णं पञ्चमं लिङ्गं पुष्कराख्येऽक्षयोद्भवम् ॥ १० ॥ (१.) पुष्कर, (२.) पुष्कराख्य, (३.) शङ्कुतेज, (४.) महाबल और (५.) गोकर्ण— ये पाँच लिङ्ग अक्षय होकर पुष्कर नामक क्षेत्र में उत्पन्न हुए। सद्यं शान्तं महाकान्तं विश्वतेजो महोद्भवम् । पञ्चाक्षयानां लिङ्गानां पौरुषे स्यात्समुद्भवः ॥ ११ ॥ (१.) सद्य, (२.) शान्त, (३.) महाकान्त, (४.) विश्वतेज, (५.) महोद्भव— ये पाँचों लिङ्ग अक्षय पौरुष क्षेत्र में उद्भूत हुए। शङ्कुं शशाङ्कशम्भू च सिद्धेशं चन्द्रशेखरम् । पञ्चाक्षयानि लिङ्गानि शङ्कुक्षेत्राधिपानि च ॥ १२ ॥ (१.) शङ्कु, (२.) शशाङ्क, (३.) शम्भू (४.) सिद्धेश और (५.) चन्द्रशेखर— ये पाँचों अक्षय लिङ्ग शङ्कु क्षेत्र में उत्पन्न हुए। वामदेवं महादेवं कान्तं कमललोचनम् । अक्षयं कल्पजं लिङ्गं सागराक्षे ? त्पराजित ॥ १३ ॥ इसी प्रकार (१.) वामदेव, (२.) महादेव, (३.) कान्त कमललोचन (४.) अक्षय और (५.) कल्पज— ये पाँचों अक्षय लिङ्ग, हे अपराजित ! सागराक्ष क्षेत्र में उत्पन्न हुए। सद्योवामस्तथाधांरस्तत्पुरुष ईश एव च। अक्षये वक्त्रजा देवा रम्यके सृष्टिसम्भवे ॥ १४ ॥ इसके अतिरिक्त (१.) सद्योवाम, (२.) अघोर, (३.) तत्पुरुष, (४.) ईश और (५.) अक्षयवक्त्र— ये पाँचों अक्षय लिङ्ग रम्यक क्षेत्र में उत्पन्न हुए। लीयन्ते सर्वदेवाश्च कल्पान्ते लिङ्गमध्यगाः । कल्पान्ततोऽक्षयं लिङ्गं सागरे ? क्षेत्राधिपम् ॥ १५ ॥

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