भारतकोश
अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)

अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)

Aparajitapriccha of Bhuvanadeva with Commentary by Shrikrishna Jugnu

भुवनदेवाचार्य (टीकाकार: डॉ. श्रीकृष्ण 'जुगनू') द्वारा

DevanagariHindipublished535 पृष्ठ

पृष्ठ 146, कुल 535 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 146

सूत्र-२१ 97 कल्प के अन्त में लिङ्ग के मध्य में सभी देवता प्रलय में लीन हो जाते हैं। कल्प के अन्त होने के साथ ही सागर में अक्षय लिङ्ग उत्पन्न हो जाते हैं। द्वीपे द्वीपे पुनस्त्वेवं रुद्रलोकलिङ्गोद्भवम्। तेभ्यो जाता पुनः सृष्टिर्जगत्स्थावरजङ्गमम् ॥ 16 ॥ प्रत्येक द्वीप में पुनः इसी प्रकार रुद्रलोक के लिङ्गों का उद्भव हो जाता है जिनसे पुनः जगत में स्थावर-जङ्गम सृष्टि की उत्पत्ति होती है। सजलाम्भोधिसंसारे एकार्णवीभूतसंस्थितौ । विशीर्णानुमार्गख्यात तत्प्रवाहेन समुद्भवाः ? ॥ 17 ॥ प्रलयकाल में एकार्णवी भूत अर्थात् एक ही सागर में लीन हो चुकी समस्त सृष्टि इस सजलाम्भोधि संसार अर्थात् जल में डूबे हुए संसार के विशीर्ण होने के साथ-साथ ही उसके प्रवाह मार्ग से विख्यात होने वाले नए संसार की उत्पत्ति हो जाती है। वर्षाश्रयासमुद्राश्च सृष्टिकालसमुद्भवाः । प्रदक्षिणं स्थितास्त्वेवं मेरोश्च परिखार्णवाः ॥ 18