अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)
Aparajitapriccha of Bhuvanadeva with Commentary by Shrikrishna Jugnu
भुवनदेवाचार्य (टीकाकार: डॉ. श्रीकृष्ण 'जुगनू') द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें98 अपराजितपृच्छा उन्हीं से यह स्थावर-जङ्गम सृष्टि इस जगत में उत्पन्न हुई है, ऐसी ख्याती है। उन्हीं काश्यप से इस संसार की सृष्टि करने वाली शक्ति रूपा प्रकृति भी हुई, ऐसा विख्यात है। दैत्यासुरी च गन्धर्वी यक्षी विद्याधरी तथा। वैदेवी नागराजेन्द्री नरेन्द्री नाम चाष्टमी ॥ 22 ॥ उसी शक्ति से (1.) दैत्या, (2.) आसुरी, (3.) गन्धर्वी, (4.) यक्षी, (5.) विद्याधरी, (6.) वैदेवी, (7.) नागराजेन्द्री और (8.) नरेन्द्री मातृकाएँ उत्पन्न हुईं। दितेश्च देवाः सम्भूता असुर्य्याश्चासुरोद्भवः। गन्धर्वाजाश्च गन्धर्वी यक्ष्या यक्षसमुद्भवः ॥ 23 ॥ इनमें से दिति से देवता उत्पन्न हुए, आसुरी से असुर हुए, गन्धर्वों से गन्धर्व और यक्षी से यक्ष उत्पन्न हुए। विद्याधर्यास्तदभिधाः वैदेध्याश्चैव देवताः। विहगा नागराजेन्द्रा जाता नागेन्द्रकास्तथा ॥ 24 ॥ इसी प्रकार विद्याधरी से उत्पन्न विद्याधर नामधारी हुए। वैदेवी से देवता हुए, नागराजेन्द्री से समस्त पक्षीगण हुए और नाग, उरग सर्पादि भी हुए। नरेन्द्राश्च नरा विप्रक्षत्रविट्शूद्रसञ्ज्ञकाः। षट्त्रिंशच्च₃₆ कुलान्येवं प्रकृतीनामनेकधा ॥ 25 ॥ इसी तरह नरेन्द्री से सभी नर— विप्र, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र और मनुष्यों के छत्तीस प्रकार के कुल व प्रकृति के अनुसार उनके अनेक प्रकार के प्राणी हुए। इति सूत्रसन्तानगुणकीर्तिप्रकाशप्रोक्तश्रीभुवनदेवाचार्योक्तापराजितपृच्छायां अक्षयलिङ्गसृष्ट्युद्भवाधिकारो नामैकविंशं सूत्रम् ॥ 21 ॥ इस प्रकार भुवनदेवाचार्य कृत सूत्रसन्तानगुणकीर्ति प्रकाश या अपराजितपृच्छा में अक्षय लिङ्ग सृष्टि, उद्भव अधिकार नामक इक्कीसवाँ सूत्र पूर्ण हुआ ॥ 21 ॥ पञ्चलिङ्गोद्भवकाश्यपसृष्ट्युद्भवो नाम द्वाविंश सूत्रम् ॥ 22 ॥ अपराजित उवाच - कथं लिङ्गभवा सृष्टिः समस्ता सचराचरा। कथं ब्रह्मोद्भवा चैव कथयस्व प्रसादतः ॥ 1 ॥ ब्रह्माद्यप्रभवाः के चाक्षयलिङ्गोद्भवाश्च के। के च ज्योतिर्भवाश्चैव कथयस्व प्रसादतः ॥ 2 ॥