अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)
Aparajitapriccha of Bhuvanadeva with Commentary by Shrikrishna Jugnu
भुवनदेवाचार्य (टीकाकार: डॉ. श्रीकृष्ण 'जुगनू') द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसूत्र-२२ ९९ अपराजित बोले – हे प्रभु! यह सचराचर सृष्टि किस प्रकार लिङ्ग से उत्पन्न हुई और किस प्रकार ये सब ब्रह्मा से उत्पन्न हुए, कृपा करके कहिए। ब्रह्मा से आरम्भ होने वाले कौन हैं, अक्षय लिङ्ग से उत्पन्न होने वाले कौन हैं और ज्योति से उत्पन्न होने वाले कौन हैं, इस सब को कृपाकर कहिए। विश्वकर्मोवाच – एकादशकोटिरुद्रा भैरवाश्चाष्टकोटयः। योगिन्यो द्विरद कोटयो लिङ्गेभ्यश्च समुत्थिताः ॥ ३ ॥ खेचरी भूचरी विद्या स्तम्भिनी मोहिनी तथा। विद्वेषिणी त्रोटिनी च एता लिङ्गसमुद्भवाः ॥ ४॥ विश्वकर्मा कहने लगे – हे पुत्र! अक्षयलिङ्ग से 11 करोड़ रुद्र, 8 करोड़ भैरव और 64 करोड़ योगिनियाँ उत्पन्न हुईं। इसी प्रकार खेचरी (आकाशगामी), भूचरी (भूगामी), स्तम्भिनी (स्तम्भन करने वाली), मोहिनी (मोहित करने वाली), विद्वेषिणी (वैरोत्पन्न करने वाली), त्रोटिनी (टोनाहिन) — सभी विद्याएँ अक्षयलिङ्ग से उत्पन्न हुई हैं। अणिमा लघिमा ख्याता महिमा सहजा तथा। अष्टासिद्ध्युद्भवा विद्याक्षयलिङ्गसमुद्भवा ॥ ५॥ इसी प्रकार अणिमा, लघिमा, महिमा, सहजा आदि अष्ट सिद्धियों¹ से उत्पन्न होने वाली प्रसिद्ध विद्याएँ भी अक्षयलिङ्ग से उत्पन्न हुईं। मन्त्रमुद्राः समस्ताश्च योगिनोयोगनिर्मलाः। अर्चा पूजा प्रतिष्ठाश्च सर्वा लिङ्गसमुद्भवाः ॥ ६॥ समस्त मन्त्र मुद्राएँ और योग से निर्मल योगिनियाँ, मूर्तियाँ और उनकी पूजा एवं प्रतिष्ठा विधि भी अक्षयलिङ्ग से उत्पन्न हुई। वेदागमपुराणानि अन्थादिदर्शनानि च। अक्षयलिङ्गोत्पन्नानि तथान्यच्च वदामि ते ॥ ७॥ इसी प्रकार वेद, आगम, पुराण, दर्शनों के ग्रन्थादि भी अक्षयलिङ्ग से उत्पन्न हुए हैं। अन्य जो उत्पत्तियाँ हुई हैं उनको भी मैं कहता हूँ। निघण्टुर्व्याकरणानि ह्यष्टौ स्थानानि वै तथा। वेदोद्भवश्च लिङ्गेभ्यस्तथान्ये च दिवौकसः ॥ 8 ॥
- अष्टसिद्धि– 1. अणिमा, 2. महिमा, 3. लघिमा, 4. गरिमा, 5. प्राप्ति, 6. प्राकाम्य, 7. ईशित्व एवं 8. वशित्व। (मार्कण्डेयादि पुराण)