अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)
Aparajitapriccha of Bhuvanadeva with Commentary by Shrikrishna Jugnu
भुवनदेवाचार्य (टीकाकार: डॉ. श्रीकृष्ण 'जुगनू') द्वारा
पृष्ठ 149, कुल 535 में से
संदर्भ में पढ़ें100 अपराजितपृच्छा सप्तस्वरास्त्रयो ग्रामा मूर्च्छनास्त्वेकविंशतिः। एकोनपञ्चशत्तानाः सर्वे लिङ्गसमुद्भवाः॥ 9॥ अष्टाध्यायी व्याकरण और निघण्टु-शब्दकोश तथा आठों प्रकार के वेदोद्भव के स्थान (जटा माला शिला लेखा ध्वजो दण्डो रथो घन, अष्टोविकृतयः प्रोक्ता क्रम पूर्वा मनीषिभिः॥ विकृतवल्ली 1, 5) भी अक्षयलिङ्ग से उत्पन्न हुए तथा समस्त देवता भी इसी से उत्पन्न हुए। सङ्गीत के सातों स्वर, तीनों ग्राम और इक्कीस मूर्च्छनाएँ¹ आदि तथा उनचास तानें² सभी अक्षयलिङ्ग से उत्पन्न हुईं। सर्वाणि यानि तीर्थानि ह्युद्भवन्तीह भूतले। तान्युत्पन्नानि लिङ्गेभ्यो वर्तन्ते सचराचरम्॥ 10॥ इस भूमितल पर जहाँ-जहाँ भी सब तीर्थ होते हैं, उनकी उत्पत्ति भी अक्षलिङ्ग से हुई, ऐसा सचराचर में व्यवहार किया जाता है। मन्त्रसिद्धिक्रियायोग तीर्थधर्मसत्यानृतम्। पृथिव्यापस्तथा तेजो वायुराकाश एव च॥ 11॥ लिङ्गोद्भवानि चैतानि जगदुत्पत्तिकारणम्। सर्वात्मलीला भूतानां लिङ्गानां लिङ्गतो भवः॥ 12॥
- इक्कीस प्रकार की मूर्च्छनाओं में से सात-सात प्रति ग्रामाश्रित है। इनके नाम हैं- 1. सौवारी, 2. हारिणीश्वा, 3. कलोपनता, 4. शुद्धमध्यमा, 5. मार्गी, 6. पौरवी और 7. ऋषका। ये सात मध्यम ग्राम की हैं। इसके बाद 1. उत्तरमन्द्रा, 2. रजनी, 3. उत्तरायता, 4. शुद्धषड्ज, 5. मत्स्यीकृता, 6. अश्वक्रान्ता और
- उद्गता- ये षड्ज ग्रामिका की कही गई है। इसी प्रकार 1. आलापा, 2. कुन्तिमा, 3. शुद्धा, 4. उत्तरा, 5. षड्जा, 6. पञ्चायता और 7. उद्गता। ये सात गान्धार ग्रामाश्रित कही गई है। (विष्णुधर्मोत्तरपुराण तृतीय खण्ड, अध्याय 18)
- वायुपुराण (86, 41-50) में आया है कि मध्यम ग्राम की तान संख्या 20, षड्ज ग्राम की 14 तथा गांधार ग्राम की 15 भी मानी गई है। इस प्रकार उनचास तानें होती हैं। विष्णुधर्मोत्तरपुराणकार की भी मान्यता यही है। इनके नाम किञ्चित पाठान्तर से इस प्रकार आए हैं- 1. अग्निष्टोमिक, 2. अति अग्निष्टोमिक, 3. वाजपेयिक, 4. पौण्डरीक, 5. आश्वमेधिक, 6. राजसूयिक, 7. बहुसुवर्णिक, 8. गोसविक, 9. महाव्रतिक, 10. ब्रह्मतन, 11. प्राजापत्य, 12. नागाश्रय, 13. यज्ञाश्रय, 14. गोदानिक, 15. हयक्रान्त, 16. अजक्रान्त, 17. विष्णुकान्त, 18. अरण्य, 19. मत्तकोकिल और 20. उज्जिविक — ये मध्यम ग्रामाश्रित हैं। चौदह तानें षड्ज ग्रामिका हैं- 1. प्रस्वापन, 2. पैशाच, 3. जीवन, 4. सावित्र, 5. अर्धसावित्र, 6. सर्वतोभद्र, 7. सुवर्ण, 8. विष्णु, 9. जिष्णु;, 10. विष्णुनर, 11. शारद, 12. विजय, 13. हंस और 14. ज्येष्ठ। इसी प्रकार गान्धार ग्रामाश्रिता पन्द्रह तानें कही गई हैं- 1. तुम्बुरुप्रिय, 2. महालक्ष्मण, 3. गन्धर्वानुमत, 4. अलम्बुसप्रिय, 5. नारदप्रिय, 6. भीमसेनप्रिय, 7. विनत, 8. मातङ्ग, 9. भार्गवप्रिय, 10. अभिराम, 11. संश्राव्य, 12. किन्नरप्रिय, 13. पुण्य, 14. मनोहर और 15. कल्याणकर। (विष्णुधर्मोत्तर.
- 18 गद्य भाग)