भारतकोश
अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)

अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)

Aparajitapriccha of Bhuvanadeva with Commentary by Shrikrishna Jugnu

भुवनदेवाचार्य (टीकाकार: डॉ. श्रीकृष्ण 'जुगनू') द्वारा

DevanagariHindipublished535 पृष्ठ

पृष्ठ 142, कुल 535 में से

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सूत्र - १० सर्वभूतानि दहति कालाग्निश्चापरस्तथा ॥ २६ ॥ कल्पान्त में सभी दिशाओं में भीषण सूर्यों का आतप फैल जाता है— पूर्व में दो सूर्य, दक्षिण में दो, पश्चिम में दो, उत्तर में दो सूर्य; नागलोक, पाताल में दो सूर्य और आकाश में ऊपर की ओर भी दो सूर्य— इस प्रकार बारहों आदित्य कल्पान्त में सभी दिशाओं से पृथ्वी को इस प्रकार जलाने लगते हैं मानों कालाग्नि में जल रहे हों। देवदानवगन्धर्वान् पिशाचोरगराक्षसान् । पृथिव्यां दह्यमानायां हविर्गन्धः प्रजायते ॥ २७ ॥ अस्तंगते सूर्यबिम्बे द्रोणमेघोद्भवस्तथा । वर्षन्ते च महोमेघा धारा करिकरानिव ॥ २८ ॥ इस तरह देवों, दानवों, गन्धवों, पिशाचों, उरगों, राक्षसों और पृथ्वीवासी मनुष्यों के जलने से ऐसी दुर्गन्ध प्रसारित हो जाती है जैसी पशुओं की हवि देने पर फैलती है। सूर्य बिम्ब के अस्तंगत होने पर भयङ्कर द्रोण मेघों का उदय होता है। वे बहुत घनी वर्षा करते हैं। इन महामेघों से होने वाली भयानक वर्षा की झड़ी और धाराएँ ऐसी लगती है मानों विशाल हाथी अपनी सूण्ड से पानी की भयङ्कर बौछार कर रहे हों। अष्टादशैव मेघाश्च महाद्रोणघनोदये । पृथिवीत्थं समन्ताच्य समुद्रैश्चार्णवीकृता ॥ २९ ॥ चतुर्दशलक्षयोजनानि ध्रुवं रक्षतु उदकोद्भवम् । तमस्त्रौ विशीर्यन्ते अम्भोर्भव तनो वृता ? ॥ ३० ॥ अन्धकारे तथा घोरे नष्टे स्थावरजङ्गमे । चन्द्रार्कपवने नष्टे ज्योतिषि प्रलयं गते ॥ ३१ ॥ इस तरह प्रलयङ्कारी महाद्रोण मेघों के उदय होने पर अठारहों प्रकार के मेघ चारों ओर से घिर आते हैं और समस्त पृथ्वी को भयानक वर्षा से आप्लावित करके एक तरह से चारों ओर समुद्र रूप में अर्णवीकृत कर देते हैं। जल ही जल का सागर बना देते हैं। चौदह लाख योजनों तक यह जल चारों ओर एक तरह से ध्रुव रूप से, स्थायी लगने लगता है और जब रात्रि की तमिस्रा अर्थात् अन्धकार मिटने लगता है और पुनः सूर्य बिम्ब का उदय होने लगता हे तो इस जल से आवृत्ता सभी स्थावर, जङ्गम जीव, चन्द्र, सूर्य, पवन, ज्योतियाँ आदि जो अन्धकार में नष्ट होकर प्रलय को प्राप्त हो गई थीं (पुनः सृष्टिभूत होने लगती हैं)।