भारतकोश
अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)

अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)

Aparajitapriccha of Bhuvanadeva with Commentary by Shrikrishna Jugnu

भुवनदेवाचार्य (टीकाकार: डॉ. श्रीकृष्ण 'जुगनू') द्वारा

DevanagariHindipublished535 पृष्ठ

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84 अपराजितपृच्छा षष्ठी₆ च सप्तमी₇ चैव ह्यष्टमी₈ नवमी₉ तथा। दशम्ये₁₀कादशी₁₁ चैव द्वादशी₁₂ च त्रयोदशी₁₃ ॥ ९॥ चतुर्दशी₁₄ पौर्णमासी₁₅ तिथयश्चन्द्रसम्भवाः। चन्द्रस्तु षोडश₁₆कलस्तिथयो दशपञ्चभिः₁₅ ॥ १० ॥ नन्दादिक से आदि करके काल पन्द्रह होते हैं। प्रतिपदा को नन्दा, द्वितीया को भद्रा, तृतीया को जय, चतुर्थी को रिक्ता और पञ्चमी को पूर्णातिथि कहा जाता है, और ऐसे ही आगे (इसी क्रम से षष्ठ्यादि से न्यास करने पर) अन्य तिथियाँ होती है। षष्ठी, सप्तमी, अष्टमी, नवमी, दशमी, एकादशी, द्वादशी, त्रयोदशी, चतुर्दशी और पूर्णमासी तिथियाँ चन्द्रमा से बनती है। चन्द्रमा की सोलह कलाएँ हैं और तिथियाँ पन्द्रह हैं। षोडशचन्द्रकलामाह — शशिनी शान्तिनी चैव लक्ष्मणी कामिनी तथा। पुषिणी च शुभा शान्ता चाह्लादा कुमुदा तथा ॥ ११ ॥ शस्याशिनी मानिनी च तथा विद्याविशोधिनी। महिषी द्वीपिनी सौम्या चामृता षोडशी तथा ॥ १२ ॥ चन्द्रमा की सोलह कलाएँ इस प्रकार हैं— (1.) शशिनी, (2.) शान्तिनी, (3.) लक्ष्मणी, (4.) कामिनी, (5.) पुषिणी, (6.) शुभा, (7.) शान्ता (8.) आह्लादा, (9.) कुमुदा, (10.) शश्याशिनी, (11.) मानिनी, (12.) विद्या विशोधिनी, (13.) महिषी, (14.) द्वीपिनी, (15.) सौम्या और सोलहवीं (16.) अमृता। सितपक्षे वर्द्धते च क्षीयते कृष्णपक्षके। पूर्णिमा पूर्णचन्द्रेऽमावास्या क्षीणविधौ स्मृता ॥ १३ ॥ शुक्लपक्ष में चन्द्रमा की कलाएँ बढ़ती हैं और कृष्णपक्ष में घटती जाती हैं। पूर्णचन्द्र होने पर पूर्णिमा कही जाती है और चन्द्रमा के क्षीण हो जाने को अमावस्या कहा जाता है। मासनामानि — पूर्णमासे उभौपक्षावथ मासाभिधेयकम्। कार्त्तिको मार्गशीर्षश्च पौषो माघोऽथ फाल्गुनः ॥ १४ ॥ चैत्रौ वैशाखज्येष्ठौ च ह्याषाढश्चैव श्रावणः।