भारतकोश
अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)

अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)

Aparajitapriccha of Bhuvanadeva with Commentary by Shrikrishna Jugnu

भुवनदेवाचार्य (टीकाकार: डॉ. श्रीकृष्ण 'जुगनू') द्वारा

DevanagariHindipublished535 पृष्ठ

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सूत्र-१९ 85 पूर्णमास दो पक्षों का होता है। इसे ही मास का नाम दिया गया है। कार्तिक, मार्गशीर्ष, पौष, माघ, फाल्गुन, चैत्र, वैशाख, ज्येष्ठ, आषाढ़, श्रावण, भाद्रपद और आश्विन— ये बारहों मासों के नाम हैं। कार्तिक्यात्षडृतुवः — कार्तिकाद्या द्वादशस्युर्याभ्यां द्वाभ्यामृतूद्भवः । अभिधानानि कथये षडृतूनामनुक्रमात् ॥ 16 ॥ कार्तिक आदि से आरम्भ करके बारहों मास में दो-दो मास की ऋतुएँ होती हैं। इन षट् ऋतुओं के नाम अनुक्रम से कहता हूँ— वसन्तग्रीष्मौ वर्षाश्च शरद्धेमन्त एव च। शिशिरश्च षडृतवश्चैत्रिकादिद्विमासकाः ॥ 17 ॥ (1.) वसन्त, (2.) ग्रीष्म, (3.) वर्षा, (4.) शरद, (5.) हेमन्त और (6.) शिशिर— ये दो-दो मास की ऋतुएँ चैत्रादि मास से क्रमशः होती है। वार्षिकात्मकद्वैर्तुकालमाह — द्वौ ऋतू भवतः कालः शीतोष्णवार्षिकात्मकः। दो ऋतुओं का काल भी होता है जो एक वर्ष में शीत और ग्रीष्म ऋतु दो नामों से जाना जाता है। त्र्यर्तुकालमाह — कीर्तिकादिभवः शीतो ग्रीष्मः फाल्गुनतः स्मृतः ॥ 18 ॥ तथाषाढादितः प्रावृट् सर्वबीजहितात्मिका । एवं स्यात् त्रिविधः कालः शीतोष्णप्रावृडात्मकः ॥ 19 ॥ कार्तिक से आरम्भ होने वाले को शीत एवं फाल्गुन से आरम्भ होने वाले काल को ग्रीष्म कहते हैं तथा आषाढ़ से आरम्भ होने वाली ऋतु को प्रावृट् या वर्षाकाल कहा जाता है जो कि समस्त बीजों के लिए हितकारी है। इस तरह शीत, ग्रीष्म और वर्षाकाल— ये तीन काल होते हैं। कालत्रयं षडृतबो माससङ्ख्यातु द्वादश₁₂ । चतुर्विंशति₂₄ पक्षाश्च षष्ठ्युत्तरशतत्रयम्₃₆₀ ॥ 20 ॥ दिनानि स्युस्तथा चैवं वर्ष चैव प्रवर्तते । इत्यादियुक्तियोगेन प्रोक्तः संवत्सराभिधः ॥ 21 ॥ जैसा कि कहा गया है कि काल तीन हैं, ऋतुएँ छह हैं और मास बारह हैं जबकि पक्ष चौबीस। इनमें सामान्यतः तीन सौ साठ दिन होते हैं। इतने ही दिनों से