भारतकोश
अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)

अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)

Aparajitapriccha of Bhuvanadeva with Commentary by Shrikrishna Jugnu

भुवनदेवाचार्य (टीकाकार: डॉ. श्रीकृष्ण 'जुगनू') द्वारा

DevanagariHindipublished535 पृष्ठ

पृष्ठ 122, कुल 535 में से

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सूत्र- १७ 73 इनमें बीज रूप से सत्व स्थित है। इस प्रकार इन तीनों से इस संसार की उत्पत्ति सम्भव हुई है। इति सूत्रसन्तानगुणकीर्तिप्रकाशप्रोक्त श्रीभुवनदेवाचार्योक्तापराजितपृच्छायां सत्त्वरजस्तमोऽधिकारो नाम षोडश सूत्रम् ॥ 16 ॥ इस प्रकार भुवनदेवाचार्य कृत सूत्रसन्तानगुणकीर्ति प्रकाश या अपराजितपृच्छा में सत्व- रज-तम अधिकार नामक सोलहवाँ सूत्र पूर्ण हुआ ॥ 16 ॥ ग्रहादिध्रुवमण्डलं सप्तदश सूत्रम् ॥ 17 ॥ अपराजित उवाच - कथं दिनं कथं रात्रिः संसारसृष्टिकोद्भवः । केन साऽऽक्रमते चेत्थं चन्द्रसूर्यभ्रमणे रता ॥ 1 ॥ नक्षत्राणि ग्रहाश्चैव ध्रुवाद्याश्च समस्तकाः । तेषां मृत्युः कथं प्रोक्तः कथयस्व प्रसादतः ॥ 2 ॥ अपराजित बोले – इस संसार में दिन कैसे उत्पन्न हुआ और रात्रि कैसे हुई और किसके द्वारा इन चन्द्र-सूर्य को भ्रमण कराने में क्रम से शक्ति लगी हुई है ? समस्त ग्रहों, नक्षत्रों और ध्रुवादिक की विलुप्ति कैसे होती है, इसे आप कृपापूर्वक कहिए। विश्वकर्मोवाच – तेजसः काश्यपस्यर्कचन्द्रमृत्युसमुद्भवः । शिवशक्तिसमायोगात् संसारसृष्टिसम्भवः ॥ 3 ॥ शिवः सूर्यः शशी शक्तिः संसारसृष्टिकोद्भवः । दिवाकरः शिवो भूत्वा शशी चैव निशाकरः ॥ 4 ॥ दिवारात्रिसमायोगो योगश्च चन्द्रसूर्ययोः । तेजसो मृत्युसंयोगः संयोगः सृष्टिकारकः ॥ 5 ॥ विश्वकर्मा बोले – काश्यप के तेज से सूर्य-चन्द्र और मृत्यु समुद्भूत हुए। शिव-शक्ति के सहयोग से ही यह सृष्टि सम्भव हुई है। शिव सूर्यरूप है और शक्ति चन्द्ररूप, इन दोनों से सृष्टि उत्पन्न हुई और दिवाकर सूर्य होकर तथा निशाकर शक्ति होकर दिन और रात्रि का समायोग करते हैं। यही योग सूर्य और चन्द्र दोनों का है। इसी तरह तेजस से मृत्यु का संयोग होता है और इस संयोग को सृष्टिकारक भी कहते हैं।

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