अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)
Aparajitapriccha of Bhuvanadeva with Commentary by Shrikrishna Jugnu
भुवनदेवाचार्य (टीकाकार: डॉ. श्रीकृष्ण 'जुगनू') द्वारा
पृष्ठ 123, कुल 535 में से
संदर्भ में पढ़ेंअथ सूर्यचन्द्रवंशानुकीर्तनम् — सूर्यवंशोद्भवाश्चैव चन्द्रवंशोद्भवा नृपाः । प्रवर्तते मही राज्य नृपश्च पृथिवीपतिः ॥ 6 ॥ (प्रारम्भिक वंशों में) सूर्यवंश में उत्पन्न होने वाले राजाओं और चन्द्रवंश में उत्पन्न होने वाले राजाओं ने इस पृथ्वी पर राज्य सञ्चालित किया और पृथिवीपति कहलाए। सूर्यवंशे पृथूराजा बुधः शशिकुलोद्भवः । सूर्यवंशसमृद्धौ तु क्षीयते सोमवंशकः । सोमवंशसमृद्धौ च क्षीयते सूर्यवंशकः ॥ 7 ॥ एकोत्तरशतं यावत् क्षीयते वंशकावुभौ । पृष्ठोरुस्पर्शभूतश्च सम्प्रवेत दूंसाधिपः ? ॥ 8 ॥ सूर्यवंश में राजा पृथु हुए और चन्द्रवंश में बुध राजा हुए। इस तरह जब-जब सूर्यवंश समृद्ध हुआ तब-तब चन्द्रवंश क्षीण हुआ और जब चन्द्रवंश समृद्ध हुआ तो सूर्यवंश क्षीण हुआ। इन दोनों ही वंशों में एक सौ एक वंशज जब तक क्षय होते हैं, तब उनके पीछे, उरुस्पर्शभूत अर्थात् अन्य वंशों के विकास के साथ-अन्य नए वंशाधिपति राजा होते हैं। ब्रह्मापुत्रो मरीचिश्च तज्जातः कश्यपो मुनिः । सूर्यो जातः कश्यपाच्च सूर्यपुत्रो मनुस्तथा ॥ 9 ॥ मनोश्चैक्ष्वाकुरुत्पन्नस्ततश्च कुक्षिसम्भवः । कुक्षिपुत्रो विकुक्षिश्च विकुक्षेर्वेनसम्भवः ॥ 10 ॥ पितामह ब्रह्मा के पुत्र मरीचि हुए। मरीचि के कश्यप हुए जो मुनि हुए। कश्यप मुनि के सूर्य हुए और सूर्य के पुत्र मनु हुए। मनु के इक्ष्वाकु उत्पन्न हुए और इक्ष्वाकु के कुक्षिवान् हुए। कुक्षिवान के विकुक्षि हुए जबकि विकुक्षि के वेन नामक राजा हुआ।¹
- चन्द्रगुप्त वेदालङ्कार ने अपने 'बृहत्तरभारत' में मेसोपोटामिया के सुमेर राजवंश और भारत के सूर्यवंशी राजवंश का एक तुलनात्मक परिचय देते हुए लिखा है कि सुमेर-सुराष्ट्र भारत से गए व्यापारी थे जिनके इतिहास में भारतीय राज्य के रूप में मेसोपोटामिया समाहित हुआ। इसी से वहाँ की वंशावली भारतीय वंशावली ही है:— सुमेरिया की वंशावली भारत की सूर्यवंशावली 1.................... 1. वैवस्वत मन