भारतकोश
अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)

अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)

Aparajitapriccha of Bhuvanadeva with Commentary by Shrikrishna Jugnu

भुवनदेवाचार्य (टीकाकार: डॉ. श्रीकृष्ण 'जुगनू') द्वारा

DevanagariHindipublished535 पृष्ठ

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72 अपराजितपृच्छा तमः पिता रजो माता गुरुः सत्त्वं प्रतिष्ठितम् । एवं प्रवर्तते सृष्टिः संसारे मोहशालिनी ॥ ९ ॥ रजो रक्तं समाख्यातं तमः शुक्रं प्रतिष्ठितम् । सत्त्वं पवन इत्युक्तं संसारे सृष्टिमालिनी ॥ १० ॥ तम पिता के रूप में, रज माता के रूप में और सत्व गुरु के रूप में प्रतिष्ठित है। इस प्रकार इन तीनों से संसार में मोहशालिनी यह सृष्टि प्रवर्तित हुई है। रज रक्त रूप में विख्यात है और तम शुक्र के रूप में प्रतिष्ठित है। सत्व पवन रूप में कहा गया है। इस तरह इस संसार में सृष्टि होने से इन तीनों रज, तम और सत्व की शृङ्खला बनी हुई है। रजः सूर्यः समाख्यातस्तमश्चैवं तु चन्द्रमाः । सत्त्वं पवनमित्याहुः संसारमोघमालिका ॥ ११ ॥ इसी प्रकार रज सूर्य के रूप में विख्यात है और तम चन्द्रमा के रूप में है जबकि पवन के रूप में सत्व है। इससे संसार में अमोघ शृङ्खला चलिष्णु है। रजः पृथ्वी समाख्याता तमश्चाकाशसम्भवम् । सत्त्वं पवनमित्युक्तं वर्तते मोघमालिनी ॥ १२ ॥ पुनः देखें कि रज पृथ्वी कही गई है और तम को आकाश तथा सत्व को पवन कहा गया है। इस तरह यह पवन इस रज-तम की मोघमाला को वर्तता है अर्थात् चलाता है। रज आपस्तथा ख्याता तमस्तेजः समुद्भवम् । सत्त्वं मारुतमित्याहुस्त्रिभिः संसारसम्भवः ॥ १३ ॥ रज जो जल के रूप में विख्यात है और तम अग्नि के रूप में उद्भूत है। सत्व मारुत के रूप में है। इन तीनों से ही यह संसार सम्भव हुआ है। इच्छाशक्ती राजसी स्यात् तामसी तु क्रियात्मिका । सात्त्विकी ज्ञानशक्त्याख्या शम्भुसंसारसम्भवाः ॥ १४ ॥ इच्छा शक्ति को राजसी कहा है और क्रियात्मिका शक्ति को तामसी कहा है जबकि ज्ञानशक्ति को सात्विकी कहा है जो शम्भू स्वरूप है और इन तीनों से ही यह संसार हुआ है अर्थात् यह सृष्टि रचना हुई है। शक्तिरूपे रजः ख्यातं शिवरूपे तमो मतम् । बीजरूपे स्थितं सत्त्वं त्रिभिः संसारसम्भवः ॥ १५ ॥ शक्ति रूप में रज विख्यात है और शिव रूप में तम विख्यात है, ऐसा समझें।