भारतकोश
अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)

अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)

Aparajitapriccha of Bhuvanadeva with Commentary by Shrikrishna Jugnu

भुवनदेवाचार्य (टीकाकार: डॉ. श्रीकृष्ण 'जुगनू') द्वारा

DevanagariHindipublished535 पृष्ठ

पृष्ठ 151, कुल 535 में से

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सूत्र-२३ 103 है। ऐसे विष्णु के जन्म रहस्य के बारे में तुम सुनो जो महाआनन्द देने वाला है। पठन पर यह दशावतार का उत्पत्ति प्रसङ्ग पापों का नाश करने वाला है, उस वैष्णव-स्वरूप के प्रादुर्भाव को मैं कहता हूँ जिसको भक्ति और प्रयत्न पूर्वक पढ़ने वाला व्यक्ति परमगति को प्राप्त कर लेता है। दशावतारनामानि — मत्स्यः कूर्मो वराहश्च नारसिंहोऽथ वामनः । रामो रामश्च कृष्णश्च बुद्धः कल्की च ते दश ॥ 6 ॥ विष्णु के दस अवतार हैं— (1.) मत्स्य, (2.) कूर्म, (3.) वराह, (4.) नरसिंह, (5.) वामन, (6.) परशुराम, (7.) दाशरथीराम, (8.) श्रीकृष्णचन्द्र, (9.) बुध एवं (10.) कल्कि। तस्मिन्नेकार्णवे घोरे नष्टे स्थावरजङ्गमे। चन्द्रार्कपवने नष्टे ज्योतिषि प्रलयं गते ॥ 7 ॥ एवं जाते तदा काले ध्यानयुक्तः पितामहः। सम्भूतो दानवः शङ्खो हृतवान् वेदमर्णवे ॥ 8 ॥ (पूर्वकाल की बात है जब सर्वत्र जल ही था) उस एकार्णव स्थिति में समस्त स्थावर-जङ्गम सृष्टि नष्ट हो गई थी। चन्द्र-सूर्य, पवन भी नष्ट हो गए और ज्योतिष या समस्त् तारागण भी प्रलय में तिरोहित थे। जब सब कुछ इस स्थिति में नष्टभूत थे, पितामह ब्रह्माजी ध्यानस्थ थे। तब शङ्ख नामक दानव उत्पन्न हुआ जो वेदों को चुराकर उस महासागर में डूबो देने को आतुर था। गतश्च विष्णुपाश्र्वे च क्षीराब्धौ च पितामहः। महासुरोऽनन्तरूपो वेदान् हृत्वा गतोऽर्णवे ॥ 9 ॥ वह शङ्ख दानव क्षीरसागर में अनन्त नाग की शय्या पर शयन किए भगवान् विष्णु और उनके नाभिकमल से उत्पन्न, ध्यानस्थ पितामह के पास गया और वह महा असुर अनन्त का रूप धरकर चारों ही वेदों को चुराकर महासागर में ले गया। अवतीर्णकालावधिमाह — कृतेऽष्टलक्षसहस्रशताब्देषु गतेषु च। शताब्दान्ते यथा ख्याते माघे कृष्णप्रतिपदि ॥ 10 ॥ ' पुष्यान्ते च मुहूर्ते च मनुर्नाम शुभप्रदः। महामीनो भविष्यामि सहस्रयोजनायतः ॥ 11 ॥

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