अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)
Aparajitapriccha of Bhuvanadeva with Commentary by Shrikrishna Jugnu
भुवनदेवाचार्य (टीकाकार: डॉ. श्रीकृष्ण 'जुगनू') द्वारा
पृष्ठ 152, कुल 535 में से
संदर्भ में पढ़ें104 अपराजितपृच्छा ( भगवान् विष्णु की प्रतिज्ञा है कि उक्त स्थिति में) कृत अर्थात् सत्ययुग के आठ लाख एक हजार ( 80, 1000) वर्ष बीतने पर शताब्दी के अन्त में विख्यात माघ माह के कृष्णपक्ष की प्रतिपदा को पुष्य नक्षत्र के अन्तिम चरण में, शुभ मुहूर्त में मनुगणों को शुभफल देने वाले महामीन, एक हजार योजन के आकार वाले मत्स्यावतार के रूप में अवतरित होता हूँ। घनवन्नीलवर्णश्च रताक्षश्च महोत्कटः। भृकुटिस्फुरदशनः कृत्वा कोपं जनार्दनः ॥ 12 ॥ क्रीडन्तमब्धिमध्यस्थं निहितां च कूपकर्तरि। स्यात्कलित लग्नाम्बु पद्म पुष्पोद्भवमालिका ? ॥ 13 ॥ उक्त महा मत्स्यावतार का गहरे नील वर्ण के बादलों के समान नीला वर्ण और महोत्कट- महाभयानक लाल-लाल आँखें, भृकुटि क्रोध से चढ़ी हुईं और दांत कटकटाते हुए भगवान् जनार्दन प्रकट हुए जो उस महासागर के जल के बीच में पुष्पों के बीच कलिका की भाँति क्रीड़ा करते दिखाई दिए। मत्स्यपुच्छाच्च निहतस्तदा चोच्छलिता छटा। छोद्ग्र धाराकुलोत्तरं भग्नं सुरा कुलावर्तपद्म ? ॥ 14 ॥ स्थललता फेनवर्णा ग्रन्थावर्णतकम् दोद्धव ? । यथा अग्र कुलावर्त भङ्गात् पुरतो वनमालिका ! ॥ 15 ॥ हतो महासुरः शङ्खो हृतैर्वेदैस्ततस्तदा। आसनं कृतमुत्सङ्गे ब्रहाणश्चैव नन्दतः ॥ 16 ॥ उन मत्स्य के पूँछ के झपटों से महासागर की जलराशि के उछाल की छटा अद्भुत थी, वे विराट ऊर्मियाँ बारम्बार तटों को स्पर्श करने के लिए उमड़ती थीं। सागर के स्थल पर चारों ओर फेन स्वरूपी बड़े-बड़े आवर्तक लहरों के उठे मानो अग्नि के झंझावाती कुलावर्तों, भँवरों से वनमालिका पूरी तरह भङ्ग हो गई हो। इस संघर्ष में शङ्खासुर मारा गया। तब उसके द्वारा चुराए गए वेद भी वे मत्स्यरूप भगवान् अपनी गोद में भली प्रकार रखकर लाए जिससे ब्रह्मा को भी बहुत आनन्द हुआ। पटहाद्या अवाद्यन्त वेदे प्राप्तेऽनु पञ्चमम्। महोत्सवे ब्रह्मलोके विष्णुलोके तथैव च ॥ 17 ॥ धर्मः प्रस्थापितो लोके सत्यं ज्ञानं च भूतले। लक्ष्म्यायुष्का नराश्चैवमक्लेशा दृढयौवनाः ॥ 18 ॥