भारतकोश
अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)

अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)

Aparajitapriccha of Bhuvanadeva with Commentary by Shrikrishna Jugnu

भुवनदेवाचार्य (टीकाकार: डॉ. श्रीकृष्ण 'जुगनू') द्वारा

DevanagariHindipublished535 पृष्ठ

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सूत्र-२३ 105 वेदों के प्राप्त हो जाने के हर्ष में पटहा आदि पाँचों प्रकार के वाद्यों का वादन कर ब्रह्मलोक व विष्णुलोक में महोत्सव मनाया गया। इस प्रकार शङ्खासुर के वध के उपरान्त पुनः लोक में धर्म की स्थापना हुई और भूतल पर सत्य व ज्ञान का विस्तार हुआ। इसके फल स्वरूप नर-नारी क्लेश रहित होकर दृढ़ यौवनयुक्त हुए और लाखों वर्षों की आयु प्राप्त करने में सक्षम हुए। एकच्छत्रं नृपो राज्यं प्राप्तवान् वेदसङ्गतौ। चक्रवर्तित्व विज्ञेयो शिवभटं सुदर्शनम् ? ॥ 19 ॥ देवाग्निगुरुपूजा च सतीसत्यं तथोत्तमम्। अग्राहां च प्रजादण्डं अद्वास्यता कृषि वेश्मता ? ॥ 20 ॥ इस समस्त पृथ्वी पर वेद सङ्गत अर्थात् वेदों में दिए गए आदेशों का पालन करने वाला एकछत्र चक्रवर्ती राजा का राज्य प्राप्त हुआ। उस चक्रवर्तित्व को पाने वाला लोकप्रिय सुदर्शन राजा शिवभट नाम से जाना गया। इस राजा के राज्य में देवपूजा, हवनादिक अग्निपूजा और गुरुपूजा तथा सर्वोत्तम सतियों का सत्य अर्थात् पातिव्रत्य पूरी तरह से व्याप्त था फलस्वरूप प्रजा धर्मानुसार चलने के कारण दण्ड प्राप्ति के लिए अग्राह्य हो गई अर्थात् तब दण्ड का प्रचलन नहीं था। सभी नागरिक स्वतन्त्रता से जीवन यापन करते थे। कोई भी व्यक्ति खेती के लिए अथवा गृहादि के लिए दास बनाकर नहीं रखा जाता था। न शोकदुःखदुर्भिक्षं न चौराश्चाभवंस्तदा। धर्मेण पालयन्धात्रीमाज्ञां चक्रे च मेदिनी ॥ 21 ॥ ईप्सितोदकं च मेघात् सर्वसस्या च मेदिनी। लक्षात्परेऽनल्पधना अतिरूपा नराः स्त्रियः ॥ 22 ॥ उस काल में कोई शोक, दुःख, दुर्भिक्ष नहीं था तथा चोरों का भी कोई भय नहीं था। तब पृथ्वी का धर्म से पालन होता था और उस राजा की आज्ञा समस्त संसार में मानी जाती थी। इसी प्रकार के खुशहाल में मेघ भी आवश्यकतानुसार वर्षा करते थे और सारी धरती पर सभी प्रकार के धान्य उत्पन्न होते थे। फलतः यहाँ के नर-नारी अत्यन्त रूपवान और स्वस्थ होते थे और लखपति होते थे, अनल्पधनी होते थे अर्थात् बहुत समृद्ध होते थे। कामिन्य ऋतुगम्याश्च ह्यायुष्काः कान्तिभिर्युताः। लोकाः शास्त्रविशेषज्ञ अग्निहोत्रं गृहेगृहे ॥ 23 ॥ त्रिदशतिथिपूजा च नित्यमेव प्रतिगृहम्।