अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)
Aparajitapriccha of Bhuvanadeva with Commentary by Shrikrishna Jugnu
भुवनदेवाचार्य (टीकाकार: डॉ. श्रीकृष्ण 'जुगनू') द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें106 अपराजितपृच्छा न विषं नैव दुःस्थानं गृहे तु धनधान्यकम् ॥ २४ ॥ उस राज्य की कामिनियाँ अर्थात् ऋतुमति नारियाँ ऋतुकाल में ही सहवास करने वाली होने के कारण कान्तियुक्त, सौन्दर्य व तेजयुक्त तथा पूरी आयु तक जीवित रहने वाली होती थी। वहाँ के निवासी लोक और शास्त्रों के विशेषज्ञ होते थे और घर-घर अग्निहोत्र का प्रचलन था। प्रत्येक घर में देवता और अतिथि की नित्य पूजा अवश्य ही होती थी। कहीं भी विष का प्रयोग (नशा) नहीं होता था। इसलिए घरों में खटपट का दुःख भी नहीं था। सभी घर धन-धान्य से परिपूर्ण होते थे। भुञ्जन्ते काञ्चने पात्रे उदते नास्ति गृह्लता ? । सन्तुष्टाः सर्वलोकास्तु धनधान्यैश्च काञ्चनैः ॥ २५ ॥ ईप्सितं तु गवां क्षीरं क्षीरे सर्पिस्तथाधिकम्। इच्छारसश्चेक्षुदण्डे शीधुपानं घटैस्तथा ॥ २६ ॥ उस समय लोग स्वर्णपात्रों में भोजन करते थे और दान देने वालों से भी दान लेने वाले कोई नहीं थे क्योंकि सभी सम्पन्न थे। कोई किसी के आगे हाथ नहीं फैलाता था। सभी लोग धन-धान्य और स्वर्णादिक से पूर्णतया सन्तुष्ट थे। ऐसे ही धर्म सम्पन्न राज्य में गायें मनचाहा दूध देती थीं और उस दूध में घी भी बहुत होता था। ईखों में पर्याप्त रस होता था, जो इतना मीठा होता था मानो घड़ों में भरा हुआ गन्ने का रस नहीं होकर अमृत हो। त्रिलक्षाब्दं मीनरूपो विष्णुः पर्यैति सागरन्। पुनर्जन्म करिष्यामि उद्धरिष्येऽमृतं यतः ॥ २७ ॥ इस प्रकार यह मत्स्यावतार रूपी विष्णु आगामी तीन लाख वर्षों तक सागर में समस्त दिशाओं में तैरते रहे। उन्होंने यह भविष्यवाणी भी की थी कि 'मैं पुनर्जन्म लूँगा और उसमें अमृत घट का उद्धार करूँगा।' इति सूत्रसन्तानगुणकीर्तिप्रकाशप्रोक्तश्रीभुवनदेवाचार्योक्तापराजितपृच्छायां प्रथमहरि- मत्स्यावताराधिकारो नाम त्रयोविंशं सूत्रम् ॥ २३ ॥ इस प्रकार भुवनदेवाचार्य कृत सूत्रसन्तानगुणकीर्ति प्रकाश या अपराजितपृच्छा में प्रथम हरि-मत्स्यावतार अधिकार नामक तेईसवाँ सूत्र पूर्ण हुआ ॥ २३ ॥