अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)
Aparajitapriccha of Bhuvanadeva with Commentary by Shrikrishna Jugnu
भुवनदेवाचार्य (टीकाकार: डॉ. श्रीकृष्ण 'जुगनू') द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसूत्र-२४ 107 कूर्मावतारे मन्दरार्णवमन्थनं चतुर्विशं सूत्रम् ॥ 24 ॥ विश्वकर्मोवाच- कल्पान्ते रत्नजातं यद् श्रीधेनुरमृतादिकम्। अन्योपस्करजातानि क्षीराब्धौ स्थापितानि तु ॥ 1 ॥ याचमानाः समस्तास्तु सुरासुरनरोरगाः। ददस्व भो विभो सर्वं स्थापितं विष्णुना च यत् ॥ 2 ॥ विश्वकर्मा ने (विष्णु के अवतारों के प्रसङ्ग में अपराजित से आगे) कहा-कल्प का अन्त होने पर जिस भाँति से रत्नों की प्राप्ति हुई, जैसे कि श्री, सुरभि, अमृत, आदि और अन्य भी काम की वस्तुएँ प्राप्त हुईं, जो क्षीरसागर में स्थित थी, इन सब रत्न राशियों को समस्त सुर, असुर, नर और उरगों ने प्रमुख माँग बना ली थी। इसलिए ये सभी मिलकर भगवान् विष्णु के पास गए और उनसे प्रार्थना करने लगे कि हे प्रभो! सागर में स्थित समस्त वैभव की वस्तओं को, रत्नों को हमें दिलाने की व्यवस्था करें। इन्द्र उवाच - काष्ठे चाग्निस्तिले तैलं क्षीरमध्ये यथा घृतम्। उद्धरिष्यामि तान् सर्वान् क्षीराब्धित विष्णुना च यत् ॥ 3 ॥ इन्द्र ने (देवों की ओर से विष्णु से) कहा- हे प्रभु! जिस प्रकार काष्ठ में अग्नि छिपी हुई है और तिल में तेल छिपा हुआ है तथा दूध में घी छिपा है, उसी तरह समुद्र के गर्भ में भी समस्त उपस्कर अर्थात् जीवनोपयोगी वस्तुएँ छिपी हुई है, उन सबको मैं उद्धार करके निकालना चाहता हूँ। चक्रुस्ते मन्थनारम्भं सुरासुरनरोरगाः। मन्थानं मन्दरं कृत्वा नेत्रं कृत्वाऽथ वासुकिम् ॥ 4 ॥¹ इसी प्रयोजन से समस्त सुर-असुर, नर-उरगों ने मिलकर समुद्र का मन्थन करना आरम्भ किया। इस कार्य के लिए इन सब लोगों ने मन्दराचल पर्वत का मन्थान अर्थात् रवाई या मथनी बनाई और वासुकी नाग को उसे घूमाने के लिए नेत्र (नेतरा, रस्सी) के रूप में काम में लिया। उद्धरिष्यति कस्तत्र क्षीरार्णवे तु मन्दरम्। गतास्ते विष्णुपाश्र्वे तु सुरासुरनरोरगाः ॥ 5 ॥
- तुलनीय विष्णुपुराणे— चकर्ष नागराजानं दैत्यमध्येऽपरेण च॥ (विष्णु. 1, 9, 89) मन्थानं मन्दरं कृत्वा नेत्रं कृत्वा च वासुकिम्॥ (तत्रैव 1, 9, 77 व 84)