अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)
Aparajitapriccha of Bhuvanadeva with Commentary by Shrikrishna Jugnu
भुवनदेवाचार्य (टीकाकार: डॉ. श्रीकृष्ण 'जुगनू') द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें108 अपराजितपृच्छा तदोपरान्त ये सभी सुर, असुर, नर और उरगगण यह जानने के लिए भगवान् विष्णु के पास गए कि क्या वे वहाँ इस क्षीरसागर से मन्दर के प्रयोग द्वारा उन समस्त उपस्करों को, रत्नों को जो क्षीरसागर में स्थित है, उद्धरित करने, निकालने में समर्थ हो सकेंगे ? कूर्मावतारमासतिथ्यादीनां - चतुर्लक्षसहस्त्रादि शतान्ताब्दे कृते गते । फाल्गुने कृष्णपक्षे च द्वितीयायां तिथौ तथा ॥ 6 ॥ मुहूर्ते कार्मुके चैव हस्तान्ते घटिकाद्वयम् । कूर्मावतारो मेदिन्यां मुहूर्ते तत्र चाभवत् ॥ 7 ॥ इस सबके उद्धार के लिए सत्युगके चार लाख, एक हजार एक सौ वर्ष बीत जाने पर, फाल्गुन मास के कृष्णपक्ष की द्वितीया तिथि के दिन, हस्त नक्षत्र के अन्तिम चरण में, दो घटी के बीत जाने पर कार्मुक मुहूर्त में इस मेदिनी पर (भगवान् विष्णु का) कूर्मावतार हुआ। तले तु कूर्मरूपेण हेमकूटनिभं गिरिम्। मन्दरं धारयिष्यामि ह्यमृतार्थेऽपराजित ॥ 8 ॥ इस पर विष्णु भगवान् ने कहा कि 'मैं कूर्म रूप में सागर के तल में रहकर स्वर्ण के स्तम्भ के समान बने हुए इस मन्दराचल पर्वत को अपनी पीठ पर धारण करूँगा जिससे मेरा अमृतोद्धार का प्रयोजन सिद्ध हो सके।' पीतवर्णो महादिव्यो दृश्यतेऽथानुवर्तुलम् । हारिद्रकश्वेतपादैर्ज्योतिर्दृष्टोऽथ निर्मलैः ? ॥ 9 ॥ शैलेन्द्रस्योत्तरे पार्श्वे क्षीरोदो नाम सागरः । प्रारब्धं मन्थनं तत्र सुरासुरनरोरगैः ॥ 10 ॥ मन्दरं मन्थनं कृत्वा नेत्रं कृत्वा तु वासुकिम् । एकतश्च सुराः सर्वे बलिमेकत्र संस्थिताः ॥ 11 ॥ पीले रङ्ग, महादिव्य वर्तुल की भाँति दिखाई देने वाला हल्दी जैसा, श्वेतपाद वाला निर्मल ज्योति वाले मन्दराचल नामक शैलेन्द्र के उत्तरी पार्श्व में यह क्षीरोद नामक क्षीरसागर था जिसे वहाँ सुर, असुर, नर और उरगों ने मथना प्रारम्भ किया। मन्दराचल को मथनी करके और वासुकी नाग को नेत्र बनाकर एक ओर तो सभी देवता एकत्र हो गए और दूसरी ओर बलि आदि असुरगण एकत्र होकर स्थित हो गए थे।