भारतकोश
अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)

अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)

Aparajitapriccha of Bhuvanadeva with Commentary by Shrikrishna Jugnu

भुवनदेवाचार्य (टीकाकार: डॉ. श्रीकृष्ण 'जुगनू') द्वारा

DevanagariHindipublished535 पृष्ठ

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सूत्र-२४ 109 क्षीरार्णवात् निर्गतरत्नद्रव्यादीनां – क्षीरार्णवे मध्यमाने सफेनोर्मिमहोत्कटे। समुद्भूतानि रत्नानि गुणतेजोमयानि च ॥ 12 ॥ मौक्तिकं वज्रवैडूर्ये पद्मरागश्च नीलकम्। हिरण्याद्यष्टलोहानि मध्यमाने तदुद्भवः ॥ 13 ॥ इस प्रकार दोनों ही ओर से सुरों और असुरों के प्रयास से क्षीरार्णव के मध्य में मन्दराचल के द्वारा मन्थन से फेनयुक्त ऊँची-ऊँची लहरें उठने लगी। मन्थन के फलस्वरूप गुण और तेजों से युक्त रत्न निकलने लगे। उन रत्नों में मोती, हीरे, वैदूर्य, पद्मराग, नीलम, सोना आदि अष्टलोह धातुएँ समुद्र के बीच से निकलीं। तदोद्भूता कामधेनुर्घृतदध्युद्भवस्ततः। क्षीरं च गोमयं मूत्रं पञ्चगव्यं प्रकीर्तितम् ॥ 14 ॥ सर्वसृष्ट्युद्भवा धेनुः सर्वकामफलप्रदा। सर्वकाममवाप्नोति कामधेनुनमस्कृतिः ॥ 15 ॥ उसी समुद्र मन्थन से कामधेनु निष्पन्न हुई जिससे घी, दही, दूध, गोमय, गोमूत्र निकले जो पञ्चगव्य नाम से जाने जाते हैं। यह कामधेनु सभी कामनाओं को पूर्ण करने वाली है इसलिए समस्त कामों को पूर्ण करने वाली कामधेनु नमस्कृत्य है। ऐरावतो गजेन्द्राणां चन्द्रश्चाप्सरसस्तथा। उच्चैःश्रवास्तुरङ्गाणां सूर्यादीनां च वाहनम् ॥ 16 ॥ इसके उपरान्त, समुद्र मन्थन से जो अन्य अन्य रत्न निकले वे हैं— गजेन्द्रों में ऐरावत हाथी, चन्द्रमा, अप्सराएँ और उच्चैःश्रवा नामक अश्व जो सूर्यादि देवताओं के वाहन बने। अमृतानां सप्तकुम्भा अमृतत्वं च दायिनः। समस्थाली च पात्राणं तलिकातां वा (वो) लुकोद्भवाः ? ॥ 17 ॥ पर्यङ्कमासनं चैव तथा सिंहासनानि च। छत्रचामरालङ्कारा धूपामोद आरार्त्तिकम् ॥ 18 ॥ सिंहासनरुद्रासनवेत्रासनमसूरकम्। गदिका पट्टपं गिट्टि प्रोक्तान्यासनकानि च ॥ 19 ॥ षोडशाभरणं दिव्यं पदादि मुकुटान्तकम्। षट्त्रिंशच्चैव ₃₆ शस्त्राणां निर्गतानि क्षीरार्णवात् ॥ 20 ॥