अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)
Aparajitapriccha of Bhuvanadeva with Commentary by Shrikrishna Jugnu
भुवनदेवाचार्य (टीकाकार: डॉ. श्रीकृष्ण 'जुगनू') द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें110 अपराजितपृच्छा इसी प्रकार अमरता देने वाले अमृत से भरे सात अमृतकुम्भ प्राप्त हुए। पकाने के लिए स्थाली- वटलोई आदि पात्र और ताम्बे की करधनी- कमरपेटी, कमरबन्ध, पर्यङ्क, आसन, सिंहासनादि, छत्र, चामर सहित अलङ्कार और आरती में प्रयुक्त होने वाले धूप-गन्धादि, सिंहासन, रुद्रासन, बेंत का आसन, मसूरक अर्थात् मसहरी या मच्छरदानी, गदला, पट्ट अर्थात् रेशम के महीन वस्त्र, गिट्टी आदि के अनेक आसन, सोलह प्रकार के दिव्य आभूषण जो कि पैर से सिर तक धारण करने योग्य थे और छत्तीस प्रकार के आयुध भी उस समुद्र से निर्गत हुए। कवचानि च रत्नानि बलीवर्दोत्सवास्तथा। पुष्पकादिविमानानि श्रीवत्सस्वस्तिकानि च ॥ 21 ॥ क्षीरार्णवे मध्यमाने निमज्जद्भिः सुरासुरैः । तत्रोत्पन्नो महावृक्षो नाम्नासुरतरुस्तथा ॥ 22 ॥ इसी प्रकार कवच¹, अन्य रत्न, बैलों से होने वाले समस्त उत्सव, पुष्पकादि विमान, श्रीवत्स, स्वस्तिकादि प्राप्त हुए। इसी क्षीरसागर का सुर व असुरगणों द्वारा मन्थन किए जाने पर इसके बीच निमज्जित हुआ सुरतरु नाम का महावृक्ष उत्पन्न हुआ अर्थात् कल्पवृक्ष प्राप्त हुआ। अथ कल्पवृक्षवर्णनमाह — नानापुष्पसमाकीर्णो नानापत्रसमाकुलः । नानाफलसमायुक्तो पञ्चशाखासमन्वितः ॥ 23 ॥ पुण्यानि तस्य पत्राणि दृष्ट्वा तीर्थमहाफलम्। तस्यानुक्रमरूपं च जातिभेदं च लक्षणम् ॥ 23-1 ॥ देशजातिकुलस्थानं वर्णभेदमतः परम्। शाखानुक्रमयुक्ती च कथयामि समासतः ॥ 23-2 ॥ उक्त कल्पवृक्ष तरह-तरह के पुष्पों से लदा हुआ था और नाना प्रकार के पत्तों से पूरी तरह लकदक था। तरह-तरह के फल इसकी पाँचों शाखाओं में लगे हुए थे। इस कल्पवृक्ष के दर्शन करने मात्र से सभी तीर्थों की यात्रा का महापुण्य फल
- कौटिलीय अर्थशास्त्र में पाँच प्रकार के कवचों का वर्णन हुआ है— लोहजाल (सिर से पाँव तक ढँकने वाला), लोहजालिका (सिर के अतिरिक्त शेष समस्त देह को ढँकने वाला), लोहपट्ट (भुजाओं को छोड़कर समस्त शरीर को ढँकने वाला), लोहकवच (केवल वक्ष व पीठ को ढँकने वाला), सूत्रकण्टक (सूत का कवच) और पँचचर्मवर्म (मत्स्य, गेंडा, नीलगाय, गज एवं वृषभ के चर्म, खुर व शृङ्ग से निर्मित कवच)। (अर्थशास्त्र अधिकरण 2, 34, 18)