अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)
Aparajitapriccha of Bhuvanadeva with Commentary by Shrikrishna Jugnu
भुवनदेवाचार्य (टीकाकार: डॉ. श्रीकृष्ण 'जुगनू') द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसूत्र-२४ 111 मिल जाता है। उनका क्रमवार रूप, जाति भेद और लक्षण, इनके देश, जाति, कुल-स्थान, वर्णभेद और इसके बाद शाखा अनुक्रम से मैं संक्षेप से कहता हूँ। नागरं द्राविडं चैव कालिङ्गं यामुनं तथा। निश्वेश्वरं समाख्यातं पञ्चपत्रसमुद्भवम् ॥ २३-३ ॥ नागरा चोत्तरा शाखा द्राविडा दक्षिणोद्भवा। कालिङ्गा पश्चिमा शाखा यामुना पूर्वदिग्भवा ॥ २४ ॥ विश्वेशा ऊर्ध्वशाखायां एञ्जातिमहोत्सवाः। एकैकं पञ्चभेदाश्च₅ कथयाम्यपराजित ॥ २५ ॥ इसके पाँच पत्र भी उत्पन्न हुए जिनके 1. नागर, 2. द्राविड़, 3. कलिङ्ग, 4. यामुन और 5. विश्वेश्वर आदि पाँच नाम विख्यात है। इनमें नागर उत्तरी शाखा के हैं और द्राविड़ दक्षिणी शाखा से उत्पन्न हुए हैं। कलिङ्ग पश्चिम शाखा से और यामुन पूर्वी शाखा से उत्पन्न हुए हैं। विश्वेशा ऊर्ध्वशाखा से उद्भूत हुए। ये पाँचों जाति महोत्सवा रूप में मान्य हैं। इनके भी पाँच-पाँच भेद हैं जिन्हें हे अपराजित ! मैं अब कहता हूँ। प₅ जातिर्दश₁₀ भेदास्तथा षोडश₁₆ वै कलाः। मासपत्रं चतुर्जातमर्बुदादिसमुद्भवम् ॥ २६ ॥ जलजं स्थलजं पत्रं मेघजं गिरिकोद्भवम्। जीवपत्रं निभाकारं भेदभिन्नं व्यवस्थितम् ॥ २७ ॥ इनकी पाँच जातियाँ हैं जिनके दस भेद हैं और उनकी सोलह-सोलह कलाएँ हैं ओर इनके हर मास चारों से उत्पन्न होने वाले अर्बुदादि (अरबों की) संख्या में हैं। जल से उत्पन्न होने वाले, स्थल से उत्पन्न होने वाले, बादलों से उत्पन्न होने वाले, पहाड़ों में उत्पन्न होने वाले जीवपत्रों के समान भिन्न-भिन्न रूपों में व्यवस्थित हैं। सर्वाभरणसंस्थानं हारकेयूरकादिकम्। स्तम्भे द्वारे गृहे शुद्धं प्रासादेषु च सर्वतः ॥ २८ ॥ × × × × × × × × × × × × ॥ २९ ॥ इस कल्पवृक्ष के द्वारा उत्पन्न होने वाले सभी आभूषणों के संस्थान में हार- केयूर आदि हैं। सर्वतः स्तम्भ, द्वार, गृह सभी शुद्ध प्रासादों के उपयुक्त हैं। ××××। यत्र तद् दृश्यते पत्रं स्त्रियस्तत्र हितेक्षणाः। तत्रोत्पन्नं तु कलशमष्टामङ्गल्यसम्भवम् ॥ ३० ॥