भारतकोश
अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)

अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)

Aparajitapriccha of Bhuvanadeva with Commentary by Shrikrishna Jugnu

भुवनदेवाचार्य (टीकाकार: डॉ. श्रीकृष्ण 'जुगनू') द्वारा

DevanagariHindipublished535 पृष्ठ

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112 अपराजितपृच्छा जहाँ-जहाँ ये पत्र दिखाई देते हैं, वहाँ-वहाँ मनोहारी दृष्टि युक्त स्त्रियाँ उत्पन्न हो जाती हैं और उनसे अष्ट माङ्गल्य प्रदान करने वाले कलश उत्पन्न हो जाते हैं। संछन्नं फलपुष्पैश्च पत्रैश्च वलयीकृतम्। अभिषेके पट्टबन्धे प्रतिष्ठोद्वहनादिषु ॥ 31 ॥ प्रासादे राजभवने कलशं विनिवेदयेत्। षोडशाभरणैर्युक्ता लक्ष्मीस्तत्र विनिर्गता ॥ 32 ॥ द्वादशादित्यसङ्काशास्त्रैलोक्यम(पि )णिदीपिका। ¹( यस्य प्राप्ये न दारिद्र्यं सा देवी प्रकीर्तिता ॥ 33 ॥ ) (वे कलश) फल और पुष्पों से आच्छादित और उनके चारों ओर वलयाकार में पत्र से निर्मित सजावट लिए होते हैं, जो अभिषेक के अवसर पर, पट्टबन्ध के अवसर पर और प्रतिष्ठा के लिए कलशों में विवाह व गङ्गोज यात्रा आदि में, प्रासादों और राजप्रासादों में इन गङ्गाजल के कलशों को आदरपूर्वक स्थपित करें। उन पर से षोडशाभरणों से युक्त महालक्ष्मी वहाँ आ जाती है। जो बारह्रों आदित्यों के समान जाज्वल्यमान प्रकाश को प्रसारित करने वाली, तीनों लोकों को आलोकित करने वाली मणिदीप की भाँति शोभायमान होती है और जिसके प्राप्त होने पर दारिद्र्य नहीं रहता जो ऐसी देवी के रूप में प्रसिद्ध है। अमृतं सर्वदेवेषु ह्यैरावतः सुराधिपे। अश्वश्च भास्करे देवेऽपस्करः सर्वतः समः ॥ 34 ॥ (मन्थन के उपरान्त) सभी देवताओं को अमृत दिया गया और इन्द्र को ऐरावत तथा सूर्य को (उच्चैःश्रवा अश्व) दिया गया। ये वस्तुएँ सभी को समान रूप से दी गई। पुनर्मन्थनात् अलक्ष्मीनिर्गतं — पुनश्च मन्थनं कृत्वा अलक्ष्मीस्तत्र निर्गता। समुपेता पञ्चगुणैर्दत्ता ऽ या तु पितामहे ॥ 35 ॥ अतिक्षुधा च दीनत्वं याचनं भ्रमणं तथा। अलक्ष्म्याः पञ्चमुद्राश्च करपात्रं च यष्टिकम् ॥ 36 ॥ (जब देवासुरों ने) पुनः क्षीरसागर का मन्थन किया तो अलक्ष्मी सागर से निकली जिसको पितामह ने एक साथ पाँच गुण दिए। अतिक्षुधा, दीन-मलीन, याचना के लिए भटकाव और भिक्षापात्र तथा यष्टि— ये पाँचों मुद्राएँ अलक्ष्मी को

  1. प्रकाशित पाठे न लभ्यते।