भारतकोश
अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)

अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)

Aparajitapriccha of Bhuvanadeva with Commentary by Shrikrishna Jugnu

भुवनदेवाचार्य (टीकाकार: डॉ. श्रीकृष्ण 'जुगनू') द्वारा

DevanagariHindipublished535 पृष्ठ

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सूत्र-२४ 113 प्रदान की गई।$^1$ तथा च मन्थने विषप्राप्तिं — पुनर्मन्थनं कृत्वा तु विषं तत्र विनिर्गतम् । न तद् गृह्णन्ति वै देवा दानवैर्नैवगृह्यते ॥ ३७ ॥ नीलकण्ठे मयूरे च तद्रूपं वृषभध्वजे । तद्रूपेण तथेशेन तस्मात्तद्भक्षितं परम् ॥ ३८ ॥ (इसके उपरान्त) पुनर्मन्थन किए जाने पर उसमें से हलाहल विष निकला जिसे न तो देवताओं ने स्वीकारा न ही दानवों ने। ऐसे में वृषभध्वज भगवान् शिव और मयूर ने उसे ग्रहण किया। इससे शिव नीलकण्ठ हो गए और मयूर भी उस विष का भक्षण करने से नीलकण्ठ रूप हो गया। इत्यमनन्तर वारुणी कलिकोद्भवं — पुनर्वनिर्गता चैव मदिरा कलिकोद्भवा ।

  1. ऋग्वेदोक्त श्रीसूक्त में लक्ष्मी की ज्येष्ठभगिनी के रूप में अलक्ष्मी का उल्लेख है। उसका स्वरूप क्षुधा- तृष्णा से
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