अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)
Aparajitapriccha of Bhuvanadeva with Commentary by Shrikrishna Jugnu
भुवनदेवाचार्य (टीकाकार: डॉ. श्रीकृष्ण 'जुगनू') द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें116 अपराजितपृच्छा कृतयुग के आधे बीत जाने पर चैत्र मास के कृष्णपक्ष की जया तिथि (तृतीया) को सूर्य नामक मुहूर्त (तृतीय मैत्र¹ संज्ञक मुहूर्त) के अन्त में, हस्त नक्षत्र के अन्तिम चरण में, दो घटिका शेष रहते महोत्कट महाविशाल, अकल्पनीय प्रमाण वाले वराह के रूप में फड़कती हुई भ्रुकुटी और किटकिटाते हुए दाँतों और अत्यन्त प्रकाशमान तेजपुञ्ज से समुद्भव अर्थात् उत्पन्न होकर इस शैल-द्वीप-सागर से युक्त पृथ्वी को अपने दाढ़ के आगे के भाग पर धारण करके सभी देवताओं से सम्पूजित होकर पृथ्वीधर होता हुआ पुनः आऊँगा। तथा च वराहावतार वर्णनं — पुष्करे परमेश्वरो नासाग्रे पवनात्मकः। वलिका ऊर्ध्वकेशेषु शम्भुसृष्टिसमुद्भवः॥ 9 ॥ (देवताओं को इस आश्वासन के बाद) भगवान् विष्णु परमेश्वर जल के तालाब में नाक से आगे पवन की फुफकार छोड़ते हुए अपने आयाल के ऊँचे-ऊँचे केशों सहित भगवान् शिव की सृष्टि में उत्पन्न हुए। अधरैश्चाधकोद्भूतं ? दंष्ट्रायां शैलसम्भवः। सरस्वती च जिह्वायां तालुकेऽमरकोटयः ॥ 10 ॥ ग्रीवायां सुरसङ्घाश्च ओष्ठयोश्चासुरास्तथा। कपाले कार्मुककरश्चन्द्राकौ चेव नेत्रयोः ॥ 11 ॥ कर्णयोश्चैव गन्धर्वास्त्रिकोटिः सार्धमस्तके। पृष्ठोपरि तथा मेरुर्लिङ्गाकारेण संस्थितः ॥ 12 ॥ अधरों के नीचे से निम्न भाग उद्भूत होता जान पड़ा तो दाढ़ों से पहाड़ बने हों, ऐसी छवि थी। जिह्वा में सरस्वती को बसाकर और तालू में करोड़ों देवताओं को बसाकर, गले में देवताओं के समूहों को बसाकर और ओठों पर असुरों को
- मुहूर्ततत्त्व में आया है कि दिन के 15 मुहूर्तों के लिए दिनमान में 15 का भाग देकर एक मुहूर्त का घट्यात्मक मान निकाला जा सकता है। दिन के ये मुहूर्त-स्वामी क्रमशः निम्नलिखित हैं- 1. ईश, 2. सर्प, 3. मित्र, 4. पितृ, 5. वसु, 6. सलिल, 7. विश्वेदेव, 8. अभिजित् (विधि), 9. विधाता, 10. इन्द्र,
- इन्द्राग्नि, 12. राक्षस अथवा निर्ऋति, 13. अम्बुनाथ, 14. अर्यमा और 15. भग¬ अह्रीशः सर्पमित्रौपितृवसुसलिलं विश्वकौकश्च वज्रीन्द्राग्नी रक्षोम्बुनाथार्यमभगमथोर्ध्वेभिज्धान इष्टः । (मुहूर्ततत्त्व 1,
- विष्णुधर्मोत्तरपुराण में वज्र के प्रश्न पर मार्कण्डेय का कथन है- दिनरात्र्योस्समारम्भे ह्यर्धं भवति पार्थिव॥ तयोर्मध्ये च सततमभिजित्त्वाभिधीयते। तयोर्द्वित्वान्मया त्रिंशन्मुहूर्ता विहितास्तव॥ नक्षत्रैर्दैवतैस्तेषां देवताः परिकीर्तिताः। केवलं क्रमहानिश्च क्रमस्तेषां निबोध मे॥ रौद्रस्सार्पस्तथा मैत्रः पैत्रो वासव एव च। आप्यो वैश्वस्तथा राजन्केश्वरः शक्रदैवतः॥ ऐन्द्राग्नेयो नैर्ऋतस्तु वारुणश्च महीपते।