अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)
Aparajitapriccha of Bhuvanadeva with Commentary by Shrikrishna Jugnu
भुवनदेवाचार्य (टीकाकार: डॉ. श्रीकृष्ण 'जुगनू') द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसूत्र-२५ 117 बसाकर, कपाल में धनुषाकार को, चन्द्रमा व सूर्य को नेत्रों में धारण करके, कानों और मस्तक में साढ़े तीन करोड़ गन्धर्वों को, पीठ पर और मेरु पर्वत को लिङ्गाकार में स्थापित किया। पञ्चवक्त्रो महादिव्यो व्योमव्यापी सदाशिवः। तस्य प्रदक्षिण मेरुर्भुवनानि चतुर्दश₁₄ ॥ 13 ॥ स्थिताश्चैकादश₁₁ रुद्रा द्वादशादित्यकास्तथा₁₂ । चतुर्दशमन्वश्च₁₄ त्रिदशास्स्युरनेकधा ॥ 14 ॥ (इसी प्रकार) यह महान वराह का स्वरूप एक प्रकार से महादिव्य व्योम व्यापी सदाशिव का ही पञ्चवक्त्र स्वरूप है जिसके मेरु शिखर के चतुर्दिक चौदह भुवन प्रदक्षिणा करते हैं। इस वराह अवतार के स्वरूप में एकादश रुद्र और द्वादश आदित्य, चौदह मनु और अनेक देवता अवस्थित हैं। उभयोर्गिरिगोत्राश्च भुजयोः शैलजास्तथ। कर्णिकायां च संसारो मणिबन्धे महोत्कटाः ॥ 15 ॥ इन्द्रः खुरेषु गन्धर्वाः क्षुररन्ध्रुषु पन्नगाः। क्षुराग्रे चाश्विनौ देवौ जानुसन्धौ च रुग्व्ययः ॥ 16 ॥ अहिला( ?जा ) हृदयदेशे जठरे जगतो धृतिः। कुक्षौ ससार्णवाः प्रोक्ताः पुच्छे सृष्टिकरस्तथा ॥ 17 ॥ भगवान् वराह की दोनों भुजाओं में गिरिगोत्रा, पहाड़ों का समूह तथा शैलजा पहाड़ी चोटियों का समूह स्थित है। श्रीवराह के कानों में और कलाइयों में महोत्कट संसार स्थित है। उनके पाँवों के खुरों में इन्द्र और गन्धर्वों का वास है जबकि खुरों के मध्य में रन्ध्र, रिक्त स्थान में पन्नग-सर्पों का वास है। खुरों के अग्रभाग में अश्विनीकुमारों का वास है। जङ्घा के सन्धि में सभी रोगों का नाश करने वाले तत्त्वों का वास है। अहिला (जा) साँपों के वंशज वराह के हृदयदेश में और समस्त जगत को वराह ने अपने पेट में धारण कर रखा है। श्रीवराह के दोनों कुक्षों में सातों महासागरों का वास कहा है और श्रीवराह की पुच्छ में सृष्टिकार ब्रह्मा का वास है। तदूर्ध्वं कूर्मरूपं तु कूर्मोर्ध्वे गरुडो मतः। पञ्चद्वे₂₅ तत्त्वानि यतः स्मृतः सृष्टिसमुद्भवः ॥ 18 ॥ पञ्चतत्त्वोद्भवा सृष्टिः ख्यातः संसारसागरः । एवमाद्योद्भवो देवः संसाराच्च समुद्धरेत् ॥ 19 ॥