भारतकोश
अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)

अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)

Aparajitapriccha of Bhuvanadeva with Commentary by Shrikrishna Jugnu

भुवनदेवाचार्य (टीकाकार: डॉ. श्रीकृष्ण 'जुगनू') द्वारा

DevanagariHindipublished535 पृष्ठ

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पृष्ठ 166

118 अपराजितपृच्छा पापात्समुद्धरेद्येन लीलया धार्यते महीम् । खुणमध्यगतो यस्य मेरुः खुणरखुणायते ॥ २० ॥ इससे ऊपर कूर्म रूप है और कूर्म के ऊपर गरुड़ माना गया है। इससे आगे पच्चीस ( पञ्च द्वे 5 × 5 = 25 ) तत्त्व कहे गए हैं जिनसे सृष्टि उत्पन्न हुई है। यूँ पञ्चतत्त्वों से इस सृष्टि में संसार, सागरादि की उत्पत्ति विख्यात् है। उसी आदिकाल में उत्पन्न होने वाले संसार का श्रीवराहदेव ने बड़ी लीला से अर्थात् खेल-खेल में आसानी से मही अर्थात् पृथ्वी को धारण करके पाप से समुद्धरित किया। पातालं यस्य कुक्षौ सकलशिखरिणो मन्दरो मेरुकाद्याः दंष्ट्राग्रे यस्य लग्ना त्रिभुवनसहिता मेदिनी सागरान्ता । आरक्ते यस्य नेत्रे सुरभिसुरदितं घर्घरं यस्य काले द्वौ कर्णौ भुजगदृष्टि कपट तनुकृत ? पातु वः श्रीवराहः ॥ 21 ॥ श्रीवराह के कुक्षों में पाताल के समस्त गिरि शिखिर मन्दराचल, सुमेरु आदि का वास है और श्रीवराह के दाँतली में त्रिभुवन सहिता यह सागरान्त महि-मेदिनी टिकी हुई है, लगी हुई है। श्रीवराह के लाल-लाल नेत्रों में सुरभि, सुर व दैत्य ( ? ) बसते हैं और उनके घर्घर शब्द में, गुरनी में काल का वास है। दोनों कान ऐसे फैले हैं मानो फन फैलाई हुई भुजङ्ग की दृष्टि हो। इस प्रकार के कपट तनु, छलिया रूप वाले श्रीवराह हमारी रक्षा करें।¹ इति सूत्रसन्तानगुणकीर्तिप्रकाशप्रोक्तश्रीभुवनदेवाचार्योक्तापराजितपृच्छायां वराहावतारनिर्णयाधिकारो नाम पञ्चविंशं सूत्रम् ॥ 25 ॥ इस प्रकार भुवनदेवाचार्य कृत सूत्रसन्तानगुणकीर्ति प्रकाश या अपराजितपृच्छा में वराहावतार निर्णय अधिकार नामक पचीसवाँ सूत्र पूर्ण हुआ ॥ 25 ॥

  1. मत्स्यपुराण में यज्ञवराह का स्वरूप इस प्रकार आया है— वेदपादो यूपदंष्ट्रः क्रतुदन्तश् चितीमुखः । अग्निजिह्वो दर्भलोमा ब्रह्मशीर्षो महातपाः । अहोरात्रेक्षणधरो वेदाङ्गश्रुतिविभूषणः ॥ आज्यनासः स्रुवतुण्डः सामघोषस्वनो महान् । सत्यधर्ममयो श्रीमान् कर्मविकर्मसत्कृतः ॥ प्रायश्चित्तनखो घोरः पशुजानुर्मखाकृतिः । उद्गीथहोमलिङ्गोऽथ बीजौषधि महाफलः ॥ वाव्यन्तरात्मा यज्ञास्थितिविकृतिः सोमशोणितः । वेदस्कन्धो हविर्गन्धो हव्यकव्यविभागवान् ॥ प्राग्वंशकायो द्युतिमान् नानादीक्षाभिरन्वितः । दक्षिणाहृदयो योगी महासत्रमयो महान् ॥ उपाकर्मौष्ठरुचकः प्रवर्ग्यावर्तभूषणः । नानाछन्दोगतिपथो गुह्योपनिषदासनः । छायापत्नीसहायो वै मणिशृङ्ग इवोच्छितः ॥ ( मत्स्य आनन्द आश्रम संस्करण पृष्ठ २४० (१३-२८)।