अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)
Aparajitapriccha of Bhuvanadeva with Commentary by Shrikrishna Jugnu
भुवनदेवाचार्य (टीकाकार: डॉ. श्रीकृष्ण 'जुगनू') द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसूत्र-२६ 119 नृसिंहवामनावतारो नाम षड्विंशं सूत्रम् ॥ २६ ॥ अपराजित उवाच - हिरण्यकशिपुर्घोरो जातः कस्मादुपायतः । अफलं वर्धितं केन ? कथयस्व प्रसादतः ॥ १ ॥ अपराजित बोले - महाघोर दुर्दान्त हिरण्यकशिपु किस उपाय से उत्पन्न हुआ ? हे तात ! कृपा करके इस बारे में कहिए कि इससे क्या-क्या अफल-निष्फल कार्य हुए। विश्वकर्मोवाच - हिरण्यकशिपुं पूर्वं कथयिष्यामि साम्प्रतम् । महोत्कटश्च येनाऽसाववध्यो देवदानवैः ॥ २ ॥ तेनस्ववशमानीताः देवासुरनरोरगाः । ससुतं वैष्णवं दिव्यं विष्णुपादसुचिन्तकम् ॥ ३ ॥ हिरण्यकशिपुर्हन्तुं प्रह्लादं प्राञ्जलिं सुतम् । कृत्वा चैवाग्निमध्यस्थं पर्वताद् विनिपातितम् ॥ ४ ॥ निबध्य च जयस्तम्भे शुभं वै वज्रशृङ्खलैः । तेनाऽसौ स्तूयमानश्च विष्णुः स्तम्भार्दनार्चितः ॥ ५ ॥ विश्वकर्मा बोले - अब मैं पहले संक्षेप में हिरण्यकशिपु के बारे में कहता हूँ। इस महोत्कट, भयङ्कर असुर के द्वारा अनेकों देव-दानवों का वध हुआ। उसने समस्त देवता, असुर, मनुष्यों और नागों को अपने वश में कर रखा था। इस दुष्ट ने, विष्णु भगवान् के चरणों में भक्ति रखने वाले अपने दिव्य वैष्णवपुत्र को भी वश में करने के लिए अग्नि के मध्य में जलाने, ऊँचे पर्वत शिखरों से गिराने, बड़ी सुदृढ़ साँकलों से जय खम्भ से बाँधकर तरह-तरह के कष्ट दिए परन्तु प्रह्लाद खम्भे से बन्धे हुए अपनी अञ्जलियों को भगवान् विष्णु की स्तुति करने में जोड़े हुए प्रार्थना करते रहे। अथ नरसिंहावतार कालादीनां - त्रयोदश₁₃ लक्षाब्देषु गतेषु च कृते युगे । राधशुक्लचतुर्दश्यां₁₄ ज्येष्ठान्ते च मुहूर्तके ॥ ६ ॥ ऊर्ध्वं सिंहतनुं कृत्वा चाधो नरतनुं तथा । स्तम्भं संस्फोट्य तं घोरं सूदयिष्यति दानवम् ॥ ७ ॥
- 'वामनावतारो नाम षड्विंशं सूत्रम्' इति प्रकाशित पाठः।