अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)
Aparajitapriccha of Bhuvanadeva with Commentary by Shrikrishna Jugnu
भुवनदेवाचार्य (टीकाकार: डॉ. श्रीकृष्ण 'जुगनू') द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें120 अपराजितपृच्छा
जब कृतयुग के तेरह लाख वर्ष व्यतीत हो जाएँगे, तब वैशाख मास शुक्ला चतुर्दशी (राध¹शुक्ल चतुर्दशी), ज्येष्ठा नक्षत्र के अन्तिम मुहूर्त में (मैं अवतार लूँगा)। मेरे देह के ऊर्ध्वभाग में सिंह का स्वरूप होगा और नीचे का भाग मानव स्वरूप में होगा। मैं उक्त विशाल स्तम्भ को फाड़कर विकराल रूप में निकलकर उस हिरण्यकशिपु को सूदयिष्यति — मारूँगा। प्रह्लादस्य तथा राज्यं विष्णुर्दास्यति भूतले। एकच्छत्रां स दत्तां च पालयेद्भूतधारिणीम् ॥ 8 ॥ (हे अपराजित!) भगवान नरसिंह का रूप धारण करने वाले विष्णु इस भूतल का राज्य प्रह्लाद को देंगे जो समस्त पृथ्वी का एक छत्र राज्य करके धरती का पालन करेंगे। नरसिंहवर्णनं — यं दृष्ट्वा नारसिंहं विक्रतनखमुखं तीक्ष्णदंष्ट्राकरालम् पिङ्गाक्षं स्तब्धकर्णं हुतवहसदृशं कुञ्चिताग्रोऽग्रकेशम्। भीतास्ते दानवेन्द्रा असुरवरभटाः शस्त्रमुद्गीर्यहस्तात् हाहा किं किं किमेतत् क्षुभितजनपदः पातु वो नारसिंहः ॥ ९ ॥ जिस नारसिंह रूप को भयानक नख-मुख, तीक्ष्ण और कराल दाँतों, लाल- लाल आँखों, चकित खड़े कानों, भयानक हुताग्नि जैसा और सिर के अयाल भाग के भयानक रूप में बिखरे उठे हुए बालों को देखकर वे सभी दानवेन्द्र, असुर वीर जिनके हाथों में गदा रूपी शस्त्र धारण किए हुए थे, भयभीत होकर हाहाकार करने लगे और डर से काँपते हुए समस्त जनपद के लोग, यह क्या है? यह क्या है?? पुकारने लगे — ऐसे नरसिंह भगवान हमी रक्षा करें। यः स्तम्भाद् गर्जमानो गगडगडगडदू बालचन्द्रार्कदंष्ट्रः व्योमाभुव्याप्यमानः पपटपटपटत् पोट्यमानः शटाभिः। दंष्ट्राभिः खाद्यमानः ककहकहकहतू स्तूयमानः सुरेन्द्रैः निष्क्रान्तो हास्ययुक्तः ककहकहकहतू पातु वो नारसिंहः ॥ १० ॥ इति नृसिंहावतारश्चतुर्थः। जो स्तम्भ फाड़कर उसमें से गर्जन करते हुए गगड-गडगडद शब्द ध्वनि करते
- ग्रन्थान्तर में द्वादश माह के नाम पर्यायानुसार इस प्रकार आए हैं— मधु-चैत्र, माधव-वैशाख, ज्येष्ठ- शुक्र, शुचि- आषाढ़, नभ-श्रावण, नभस्य-भाद्रपद, इष- आश्विन, ऊर्ज-कार्तिक, सहा- मार्गशीर्ष, सहस्य-पौष, तप-माघ, तपस्य-फाल्गुन। ये क्रमानुसार चैत्रादि बारह महीनों के पर्याय हैं— मधुश्च माधवः शुक्रः शुचिश्चापि नभाद्वयः ॥ नभस्य इष ऊर्जश्च सहाख्यश्च सहाख्यश्च सहस्यकः । तपस्तपस्यः क्रमशश्चैत्रादीनां त संज्ञकाः ॥ (नारदसंहिता ३. ४1-४३)