भारतकोश
अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)

अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)

Aparajitapriccha of Bhuvanadeva with Commentary by Shrikrishna Jugnu

भुवनदेवाचार्य (टीकाकार: डॉ. श्रीकृष्ण 'जुगनू') द्वारा

DevanagariHindipublished535 पृष्ठ

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सूत्र-२६ 121 हुए और उदित होते बालचन्द्र, द्वितीया के चन्द्र की तरह तीखे दाँतों वाले, भूमि से लेकर व्योम तक विस्तीर्ण पपटपटपटत् फटकारते हुए भरपूर बालों से युक्त, तीक्ष्ण दाढ़ों से चबाकर खा जाने की तैयारी में दाँतों को कटकटकटकटत् करते हुए भगवान् नरसिंह है— उनकी सुरेन्द्र आदि ने भी निष्प्रभ होते हुए स्तुति की। इससे भगवान् नरसिंह की हंसी छूट गई और वे ककहकहकहत् खिलखिलाकर हंस पड़े— ऐसे नरसिंह भगवान हमारी रक्षा करें। अथ पञ्चम वामनावतारणवर्णनम् — सन्धौ च समनुप्राप्ते त्रेतायाश्च कृतस्य च। अयुक्ताश्च नरा नार्यश्चाल्पशस्या तु मेदिनी ॥ 11 ॥ तीर्थात् पुण्यानि गच्छन्ति लोको दानानि वाञ्छति। दासन्ति विप्राः शूद्रेषु वैश्याश्च नृपपावनाः ॥ 12 ॥ (अब विष्णु के पाँचवें वामन अवतार का वर्णन किया जा रहा है। यहाँ प्रथमतः युगवर्णन है) त्रेतायुग एवं सत्युग के सन्धिकाल के आते-आते नर-नारी के परस्पर सम्बन्ध टूटने लगेंगे और धरती पर कृषि की उपज क्षीण हो जाएगी। ऐसे समय में तीर्थ क्षेत्रों से पुण्य का लोप हो जाएगा। लोग दान एवं भिक्षा की वाञ्छा से भट जाएँगे, विप्र लोग शूद्रों के दास होकर उनकी सेवा में तत्पर होंगे जबकि वैश्यगण भी राजाओं के आदेश बजाने में लगेंगे। भुञ्जते रौप्यपात्रेषु स्मरार्ता विप्रजातयः । नैव साङ्ख्यं नास्ति भाट्टं न दर्शनचतुष्टयम् ॥ 13 ॥ नृपा युद्धानि कुर्वन्ति भूम्यर्थे च परस्परम्। त्रिपादो वर्तते धर्मः पादश्चैकस्त्वकर्मणि ॥ 14 ॥ (तब) स्वर्णपात्रों में खाने वाले विप्रगणों का इतना पतन हो जाएगा कि उनको चाँदी के पात्रों में भोजन करना पड़ेगा, वे स्मरार्ता (कामदेव के वशीभूत) हो जाएँगे। उनमें कथा-पुराण वाचक भट्टगणों के गुण नष्टभूत होंगे और वे दर्शनचतुष्टय¹ को विस्मृत कर जाएँगे। राजा लोग ऐसे समय में अतिक्रमण करने के

  1. दर्शन चतुष्टय से आशय है— साक्षात्, पत्रिक (पत्राचार-जात), चित्र एवं स्वप्न। इनके प्रतिपाद्य भी चार हैं— हेय (त्याज्य), हेयहेतु (दुःखकारण), हान (दुःखनिवृत्ति), हानोपाय (दुःख से निवृत्ति के उपाय)। भाट्ट से यहाँ आशय नाट्यवृत्ति के उस तीसरे प्रकार से भी हो सकता है जिसके चार भेद हैं— संक्षिति (संक्षिप्त वस्तु रचना), सम्फेट (दो पात्रों के बीच सक्रोध सङ्घर्ष), वस्तूत्थापन (मन्त्रबल और मायाजाल से प्रस्तुत दृश्य) एवं अवपात (किसी पात्र के मञ्च पर उपस्थित होने से भगदड़ मचना)। (दशरूपक 2, 57-59)