अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)
Aparajitapriccha of Bhuvanadeva with Commentary by Shrikrishna Jugnu
भुवनदेवाचार्य (टीकाकार: डॉ. श्रीकृष्ण 'जुगनू') द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें122 अपराजितपृच्छा प्रयोजन से परस्पर युद्धरत रहेंगे और धर्म का एक चतुर्थांश घट जाएगा जिससे धर्म केवल तीन चौथाई ही रह जाएगा। दैत्यवंशोद्भवो राजा बली स्याद् दानगर्वितः। गर्वहा सम्भविष्यामि विष्णुर्वै बलिवञ्चने ॥ 15 ॥ अदितेः कश्यपसुतः सम्भविष्यामि भूतले। भाद्रशुक्लद्वादश्यां $_{12}$ वै श्रवणे सुमुहूर्तके ॥ 16 ॥ उक्त सन्धिकाल में दैत्यवंश में उत्पन्न होने वाले राजा बलि दान देने के अपने गर्व में फूल जाएगा, अभिभूत हो जाएगा और उसके गर्व को चूर करने के लिए विष्णु के वामन अवतार रूप में बलि राजा को ठगने के लिए अदिति के गर्भ में कश्यप ऋषि के पुत्र के रूप में इस पृथ्वी पर अवतार लेंगे। यह अवतार भाद्रपद के शुक्ल पक्ष की द्वादशी को हस्त नक्षत्र में शुभ मुहूर्त में होगा।¹ अदितेश्च समुत्पन्नो लघुकायो दृढात्मकः। तत्रोद्भविष्यदेवं च विष्णुर्वै वामनाकृतिः ॥ 17 ॥ ततो वामनरूपेण स्तूयमानो द्विजोत्तमैः। स्वागतः सिंहद्वाराग्रे बलिर्यत्र धरापतिः ॥ 18 ॥ समुच्चार्य वेदशास्त्रं द्विजसहस्रध्वनिर्यथा। बलिस्तुष्टोऽथ विप्रेन्द्र ददामि यत्तवेप्सितम् ॥ 19 ॥ (विष्णु की यह प्रतिज्ञा है कि) 'मैं अदिति के गर्भ से लघुकाय— वामन रूप में तथा दृढात्मक अर्थात् दृढ़ आत्मबल वाला विष्णु वामनाकृति में इस प्रकार उत्पन्न होऊँगा। तब मैं वामन रूप में बड़े-बड़े उत्तम द्विजों के द्वारा बलिराजा के राज्यद्वार, सिंहद्वार के आगे पूजित होकर स्वागत पाऊँगा। वहाँ मैं मानो हजारों द्विजों की ध्वनि हो रही हो, ऐसी वेदशास्त्रों की ध्वनि का उच्चारण करूँगा जिससे बलि मुझसे सन्तुष्ट हो जाएगा और मुझे विप्रेन्द्र मानकर जो कुछ मैं चाहूँगा, (वह मुझे कहेगा कि) आप जो चाहते हैं, वह मैं प्रदान करता हूँ।' विष्णुरुवाच — ममपादत्रयं भूमेर्याचनीयं नृपोत्तम। नैवाऽकाङ्क्षे च राजेन्द्र महादानानि भोगिनाम् ॥ 20 ॥
- भागवत में भी आया है— श्रोणायां श्रवणद्वादश्यां मुहूर्तेऽभिजिति प्रभुः। सर्वे नक्षत्रताराद्याश्चक्रुस्तज्जन्म दक्षिणम्॥ द्वादश्यां सवितातिष्ठन्मन्दिनगतो नृप। विजया नाम सा प्रोक्ता यस्यां जन्म विदुर्हरैः ॥ (भागवत 8, 18, 5-6)