अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)
Aparajitapriccha of Bhuvanadeva with Commentary by Shrikrishna Jugnu
भुवनदेवाचार्य (टीकाकार: डॉ. श्रीकृष्ण 'जुगनू') द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसूत्र-२७ 123 हस्तोदकं मया दत्तं यावच्चन्द्रार्कतारकम्। तं दिव्यरूपमास्थाय क्रमिष्यामि वसुन्धराम् ॥ २१ ॥ विष्णु ने (अवतार के समय राजा से कहा था) 'हे नृपोत्तम! मुझे तो केवल तीन पाँवों जितनी ही भूमि याचनीय है। हे राजेन्द्र! मैं तो अन्य भोगवादियों की भाँति बड़े-बड़े दानों की तनिक भी आकांक्षा नहीं रखता हूँ।¹ इसलिए राजा बलि यह सङ्कल्प करेगा कि 'जब तक चन्द्रमा व सूर्य सहित तारागणों की स्थिति रहेगी, तब तक के लिए मेरे द्वारा यह दान दिया जा रहा है।' ऐसे में मैं दिव्यरूप होकर समस्त वसुन्धरा को नाप लूँगा।' बलिं चैव करिष्यामि पातालतलवासिनम्। देवांश्चैव करिष्यामि स्वस्वस्थानेषु शाश्वतम् ॥ २२ ॥ 'इसी बीच, भूमि का नाप पूर्ण नहीं होने पर बलि पर अधिकार कर उसे पातालवासी बना दूँगा और देवताओं को उसके पंजे से छुड़ाकर उनके अपने-अपने स्थानों पर शाश्वत रूप में स्थापित कर दूँगा।' इति सूत्रसन्तानगुणकीर्तिप्रकाशप्रोक्तश्रीभुवनदेवाचार्योक्तापराजितपृच्छायां वामनावतारनिर्णयाधिकारो नाम षड्विंशं सूत्रम् ॥ २६ ॥ इस प्रकार भुवनदेवाचार्य कृत सूत्रसन्तानगुणकीर्ति प्रकाश या अपराजितपृच्छा में वामनावतार निर्णय अधिकार नामक छब्बीसवाँ सूत्र पूर्ण हुआ ॥ २६ ॥ रामावतारो नाम सप्तविंशं सूत्रम् ॥ २७ ॥ विश्वकर्मोवाच — त्रेताद्धे चाब्द आद्ये च ह्याषाढे कृष्णषष्ठिका। नाम प्रोक्तं पुण्डरीकं धनिष्ठान्ते मुहूर्त्तके ॥ १ ॥ जमदग्निसुतो भूत्वा रामः शस्त्रभृतां वरः। क्षत्रियांश्च वधिष्याभि पृथ्वी निःक्षत्रयी कृता ॥ २ ॥ विश्वकर्मा ने आगे कहा— त्रेतायुग के आधे व्यतीत हो जाने पर आने वाले अद्यवर्ष की आषाढ़ माह की कृष्ण पक्ष की षष्ठितिथि को पुण्डरीक नामक धनिष्ठा नक्षत्र के अन्तिम मुहूर्त में शस्त्रधारियों में परमश्रेष्ठ, महर्षि जमदग्नि के पुत्र
- वामनपुराण में आया है— गजाश्वभूमिहिरण्यादि तदर्थिभ्यः प्रदीयताम्। एतावता त्वहं चार्था देहि राजन् पदत्रयम् ॥ अर्थात् हे राजन्, हाथी, घोड़े, भूमि, सुवर्ण आदि उन-उन वस्तुओं के याचकों को दीजिए, मैं तो इतने की ही याचना करता हूँ कि मुझे तीन पग भूमि प्रदान कीजिए। (वामन. 91, 16)