भारतकोश
अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)

अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)

Aparajitapriccha of Bhuvanadeva with Commentary by Shrikrishna Jugnu

भुवनदेवाचार्य (टीकाकार: डॉ. श्रीकृष्ण 'जुगनू') द्वारा

DevanagariHindipublished535 पृष्ठ

पृष्ठ 172, कुल 535 में से

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पृष्ठ 172

124 अपराजितपृच्छा (परशु)राम हुए जिन्होंने क्षत्रियों का वध करके इस पृथ्वी को निःक्षत्रयी अर्थात् क्षत्रियों वे विहीन कर दिया। परशुराममाहात्म्यमाह - एकविंशतिवारांश्च${21}$ समुद्रान्ता च मेदिनी। तेन दत्ता द्विजवरे कश्यपे च त्वकण्टका ॥ ३ ॥ विप्रयुक्ताश्च राजेन्द्र उत्पन्ना च वसुन्धरा। समुद्रः शाम्यते येन आसिद् द्वादश${12}$ योजनैः ॥ ४ ॥ उन्होंने समुद्रान्त समस्त पृथ्वी को इक्कीस बार क्षत्रियों से शून्यकर निष्कण्टक भूमि द्विजवर कश्यप ऋषि को दान कर दी। तब से इस वसुन्धरा पर विप्रों से युक्त कराकर अर्थात् विप्रों से नियोग द्वारा नवीन राजेन्द्र उत्पन्न किए जिनसे बारह योजन तक की दूरी तक समुद्रों का शमन किया अर्थात् शासन किया। प्रवृत्तांश्चैव देशांश्च कोङ्कणांश्च चतुर्दिशम्। क्षत्रमुत्सादियिष्यामि सभृत्यबलवाहनम् ॥ ५ ॥ उन्होंने कोङ्कण सहित कई देशों के चारों ओर से आगे बढ़कर क्षत्रियों का उनके नौकरों, सेना व वाहन सहित उत्साद अर्थात् सर्वविनाश कर दिया। जमदग्निसुतो रामः पुनर्जन्म करिष्यति। तेनाहं प्रहरिष्याभ्ययोध्यायां सप्तमो हरिः ॥ ६ ॥ षष्ठं परशुरामं च हरिर्हन्ति च सप्तमः। सन्धौ च समनुप्राप्ते त्रेताया द्वापरस्य च ॥ ७ ॥ इति परशुरामावतार षष्ठः। उक्त जमदग्निसुत (परशु)राम पुनः जन्म लेगा। (भविष्य में) उसको मैं सातवें विष्णु अवतार में राम के रूप में जन्म लेकर आहत करूँगा। इस प्रकार छठवें परशुराम का सातवें हरि (श्रीराम) त्रेता एवं द्वापर युग की सन्धि आने पर हनन करेंगे। अथ दाशरथीरामचरित्रं - रामोदाशरथिर्भूत्वा कौशल्यानन्दवर्धनः। विश्वामित्रयज्ञधुर्यस्ताडकां राक्षसीं हत्वा जमदग्निसुतं जित्वा धनुर्भङ्गे सीतापत्तिः ॥ ८ ॥ (अब सातवें विष्णु के अवतार श्रीराम के चरित्र का वर्णन है) कौशल्या के आनन्द को बढ़ाने वाले राम दाशरथी होकर तथा विश्वामित्र के यज्ञ की धुरी बनकर