अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)
Aparajitapriccha of Bhuvanadeva with Commentary by Shrikrishna Jugnu
भुवनदेवाचार्य (टीकाकार: डॉ. श्रीकृष्ण 'जुगनू') द्वारा
पृष्ठ 173, कुल 535 में से
संदर्भ में पढ़ेंसूत्र-२७ 125 ताड़का राक्षसी को मारकर और जामदग्न्य राम को जीत कर धनुर्भङ्ग करके सीता के पति होंगे। वनवासं करिष्यामि सीतालक्ष्मणसंयुतः। चित्रकूटे तथा सीता पर्ययुक्ता च लक्ष्मणैः॥ 9 ॥¹ रामगिर्याश्रमे प्राप्ते तत्र वै दण्डकावने। लङ्केशेन हृता सीता कपटैर्मृगरूपतः॥ 10 ॥ बाद में सीता और लक्ष्मण के साथ वनवासी होंगे और चित्रकूट से सीता, लक्ष्मण के साथ दण्डकवन में जाकर रामगिरि आश्रम बनाकर रहेंगे। वहाँ कपटमृग का रूप बनाकर मारीच के छल से लङ्केश रावण ने सीता का अपहरण किया। हतो मृगश्च सीतार्थे त्रिशिराः खरदूषणा॥ वेषमाना शूर्पणखा धृतासु राक्षसी कृता॥ 11 ॥ सुग्रीवस्य समक्षं च हतो वाली महाबलः। तैश्चापि वानरैः सार्ध करिष्यामि यथा सुखम्॥ 12 ॥ दशयोजन ¹⁰विस्तीर्णमायतं शतयोजनैः। सेतुबन्धनमावृत्तं जले शैलसमाकुलम्॥ 13 ॥ राम ने सीता के लिए मायामृग को मार गिराया और शूर्पणखा राक्षसी जब अपमानित होकर त्रिशिरा खर और दूषण से लड़ने के लिए अपने साथ घर लाई तो राम ने खर-दूषण को भी मार दिया। बाद में राम ने सुग्रीव के समक्ष बाली जैसे महाबली को मार गिराया। इसके बाद, वानरों के साथ मिलकर आसानी से दस योजन चौड़ा और सौ योजन लम्बा शिखाखण्डों से निर्मित सेतु बाँधकर समुद्र के जल को आवृत्त किया। हत्वा तु रावणं घोरं सभृत्यं देशकण्टकम्। विभीषणाय दास्यामि राज्य निहतकण्टकम्॥ 14 ॥ सीताशुद्धिं समानीय पुष्पवृष्टिः सुरैः कृता। दत्ते विभीषणे राज्ये प्रत्यागच्छत् स्वकां पुरीम्॥ 15 ॥ इसके बाद, लङ्का पर चढ़ाई की और महादुष्ट रावण रूपी देशकण्टक को उसके समस्त सहायक अधिकारी, भृत्यों सहित मारकर विभीषण को निष्कण्टक राज्य प्रदान किया। इसके बाद सीता की मुक्ति मानकर देवताओं ने पुष्पवृष्टि की
- 'चित्रकूटे तथा सीता पर्ययुक्ता न लक्ष्मणैः ?' प्रकाशित पाठः। विशेष वाल्मीकि रामायण (२,५.६,२२-३१)