भारतकोश
अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)

अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)

Aparajitapriccha of Bhuvanadeva with Commentary by Shrikrishna Jugnu

भुवनदेवाचार्य (टीकाकार: डॉ. श्रीकृष्ण 'जुगनू') द्वारा

DevanagariHindipublished535 पृष्ठ

पृष्ठ 174, कुल 535 में से

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126 अपराजितपृच्छा और राम विभीषण को राज्य देकर सीता के साथ अपनी स्वयं की अयोध्यापुरी की ओर अग्रसर हुए। दशवर्षसहस्राणि दशवर्षशतानि च। धर्मेण पालयेद राज्यं समुद्रान्ता च मेदिनीम् ॥ 16 ॥ इति रामावतारसप्तमम्। अयोध्या में राजतिलक होने के बाद राम ने ग्यारह हजार वर्षों तक इस धरती पर आसमुद्र चक्रवर्ती राज्य किया और धर्मपूर्वक प्रजा का पालन किया। इति सूत्रसन्तानगुणकीर्तिप्रकाशप्रोक्तृश्रीभुवनदेवाचार्योक्तापराजितपृच्छायां रामावतारनिर्णयाधिकारो नाम सप्तविंशं सूत्रम् ॥ 27 ॥ इस प्रकार भुवनदेवाचार्य कृत सूत्रसन्तानगुणकीर्ति प्रकाश या अपराजितपृच्छा में रामावतार निर्णय अधिकार नामक सत्ताईसवाँ सूत्र पूर्ण हुआ ॥ 27 ॥ हरेष्टमः कृष्णावतारो नामाष्टाविंशं सूत्रम् ॥ 28 ॥ विश्वकर्मोवाच — पुनर्जन्म करिष्यामि धर्मार्थे त्वपराजित। मथुरायां चापरं तु द्वापरानते कलौ युगे ॥ 1 ॥ जातोऽवतारो विष्णोश्च दानवानां वधार्थकः। कृष्णपक्षे भाद्रपदे ह्यष्टम्यां च तिथौ तथा ॥ 2 ॥ रोहिणी नाम नक्षत्रे ह्यर्धरात्रे तथागते। वसुदेवसुतः श्रीमान् वासुदेव इति श्रुतः ॥ 3 ॥ विश्वकर्मा बोले — (भगवान विष्णु की प्रतिज्ञा है कि) धर्म के लिए मैं द्वापर युग के अन्त में कलियुग के आरम्भ में, मथुरा नगर में पुनर्जन्म लूँगा। दानवों के वध के लिए विष्णु के अवतार के रूप में जन्म ग्रहण करूँगा। भाद्रपद माह के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि, रोहिणी नक्षत्र में आधी रात्रि बीत जाने पर वसुदेव के पुत्र श्रीमान् वासुदेव के नाम से ख्यात होऊँगा। अवतारप्रयोजनोपरान्तकृष्णलीलावर्णनं — तस्य कर्माणि चाख्यास्ये शृणु चैकाग्रमानसः। पूतनां घातयिष्यामि दुष्टां वै बालघातकीम् ॥ 4 ॥ गोकुले च गतो देवो वर्तमानं महाधनम्। गवार्थे चाद्धरिष्येऽहं गिरि गोवर्द्धनं तथा ॥ 5 ॥