भारतकोश
अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)

अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)

Aparajitapriccha of Bhuvanadeva with Commentary by Shrikrishna Jugnu

भुवनदेवाचार्य (टीकाकार: डॉ. श्रीकृष्ण 'जुगनू') द्वारा

DevanagariHindipublished535 पृष्ठ

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सूत्र-२८ 127 प्रवृत्तायां महावृष्टौ गिरिपृष्ठनिवासिनाम्। कालीयकं वशीकृत्य यमुनायां महार्णवे ॥ ६ ॥ अब मैं उस अवतार में किए गए कार्यों के विषय में कहता हूँ, जिसे तुम एकाग्रचित्त होकर सुनो। सबसे पहले मैं बालघातिनी दुष्टा पूतना को मारूँगा और गोकुल में पूजनीय देवस्वरूप में जाकर वर्तमान युग के महाधन गौओं के लिए गोवर्द्धनगिरि का उद्धार करूँगा। साथ ही उस गोवर्द्धनगिरि पर रहने वालों की महावृष्टि से रक्षा करूँगा। यमुना नदी के महासागर रूपी हृद में निवास करने वाले कालीयक नाग को वश में करूँगा। समानीष्टा ? ( हा )नि पद्मानि कंसस्यार्थे तु विग्रहे। मल्लयुद्धं करिष्यामि सह तैस्तु महोत्कटम् ॥ ७ ॥ मथुरायां वधिष्यामि कंसं च केशिनं तथा। चाणूरं च तथा बाहुं मुष्टिकं च महाबलम् ॥ ८ ॥ प्रलम्बं धेनुकं चैव हारिष्टं वृषरूपिणम्। कालनेमिं हनिष्यामि त्रिषु लोकेषु विश्रुतम् ॥ ९ ॥ कंस के साथ विग्रह करने जाते समय मैं उसके लिए हानिकारक कमल के पुष्प लाऊँगा और कंस के महोत्कट, भीषण युद्ध करने वाले पहलवानों के साथ मल्लयुद्ध करूँगा। मथुरा नगरी में जाकर मैं कंस, केशी, चाणूर तथा महाबलवान् बाहु व मुष्टिक को मारूँगा। इसी प्रकार प्रलम्बासुर, धेनुकासुर, अरिष्टासुर जो कि बैल के रूप में रहता है और कालनेमि जो तीनों लोकों में विख्यात है, को भी मारूँगा। कुशस्थलीं गमिष्यामि तीर्थे चावन्तिकाश्रिते। नरकं च वधिष्यामि कुण्डलार्थे महासुरम् ॥ १० ॥ शोणिताख्यां पुरीं गत्वा करिष्ये कदनं महत्। भुजच्छेदं करिष्यामि बाणस्य रणमूर्धनि ॥ ११ ॥ शङ्करं योधयिष्यामि बाणस्यार्थे परं तप। शोणिताख्यां पुरीं गत्वा जरासन्धेन विग्रहः ॥ १२ ॥ इसके बाद मैं आवन्तिकापुरी के आश्रित कुशस्थली तीर्थ¹ को जाऊँगा। बाद में, कुण्डलों के लिए महानरकासुर का वध करूँगा। इसी प्रकार शोणितपुर नामक

  1. कुशस्थली उज्जैन का भी पूर्वनाम है। स्कन्दपुराण के आवन्त्यखण्ड में इसके नामकरण व माहात्म्य का वर्णन मिलता है। ब्रह्मा ने यहाँ कुश की मुष्टि हाथों में लेकर स्थिर व अवस्थित जगत की सृष्टि का सङ्कल्प किया था। विष्णु ने इसको ब्रह्मा को प्रदान किया था। विष्णु स्वयं यहां कुशासन पर विराजित