भारतकोश
अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)

अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)

Aparajitapriccha of Bhuvanadeva with Commentary by Shrikrishna Jugnu

भुवनदेवाचार्य (टीकाकार: डॉ. श्रीकृष्ण 'जुगनू') द्वारा

DevanagariHindipublished535 पृष्ठ

पृष्ठ 176, कुल 535 में से

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पृष्ठ 176

128 अपराजितपृच्छा बाणासुर की नगरी में जाकर भीषण रण-संग्राम मचाऊँगा और बाणासुर की भुजाओं को रणाङ्गन में काट गिराऊँगा। इस भयङ्कर युद्ध में परम तपस्वी शङ्कर भी अपने भक्त बाणासुर की सहायतार्थ आएँगे जिनके साथ मैं युद्ध करूँगा। शोणितपुर जाने के बाद जरासन्ध से विग्रह करूँगा। जरासन्धो हतो भ्रात्रा शोणितस्थे जनार्दने। जरासन्धभयत्रस्तान् रक्षिष्यति च पार्थिवान् ॥ 13 ॥ जरासन्धसुतं बाला वृद्धा पृष्टाश्च यादवाः। नव₉ कोटयः सङ्ख्यया दन्तिनां लक्षविंशतिः₂₀ ॥ 14 ॥ रथानां सार्धकोटिश्च तदर्ध च पदातयः। कोटयोऽष्टादश₁₈ तथाऽग्रे निगच्छन्ति यादवाः ॥ 15 ॥ वहाँ मैं जरासन्ध का वध करूँगा। (विश्वकर्मा ने आगे कहा कि) इसी तरह शोणितपुरी में रहने वाले बाणासुर के भाई जरासन्ध को मारकर जनार्दन विष्णु अवतार जरासन्ध से भयत्रस्त समस्त राजाओं की रक्षा करेंगे। जरासन्ध के पुत्र के बालक, वृद्ध, अनुयायी यादवों की संख्या नौ करोड़ थी जिनके पास बीस लाख हाथी थे और डेढ़ करोड़ रथ थे और इनकी आधी संख्या में पदाती (पैदल युद्ध करने वाले) सैनिक थे। इसी प्रकार अठारह करोड़ यादव (योद्धा) उसके आगे चलते थे। कृष्णकुलमध्ये भवा मध्यतलान्तरस्थिताः। तेभ्यो कपटचिताज्वालाय देवो( वां )भिधानको विदुः ? ॥ 16 ॥ प्रविष्टस्तत्र वै काले प्रतिज्ञातो महारथी।

हुए जिससे इसका नाम कुशस्थली हुआ। पूर्वकाल में इसका नाम हेमशृङ्गा था— कुशस्थलीं संस्थित एवं देव इत्थं विधात्रा पुरुषोत्तमः स्तुतः। स्थलीं कुशैरास्तारितामुपाविशत्कुशस्थलीं देवमुनीन्द्र सेविताम् ॥ समन्ततो योजनसङ्ख्ययावृत्तां ततो विधाता पुरुषोत्तमस्तथा। कुशस्थलीति प्रथितं जगत्त्रये प्रचक्रतुर्नाम च तावुभावपि ॥ तत्र विश्वपतिः श्रीमान् विश्वेशो विश्वकृद्विभुः। विश्वं शशास विश्वात्मा सर्वविश्वस्य नायकः ॥ एवं कुशस्थली ख्याता हेमशृङ्गेति या पुरा। स्तीर्णा कुशैर्यतो धात्रा कुशस्थली ततः स्मृता ॥ (स्कन्द. अवन्तिक्षेत्र माहात्म्य, 41, 29-32) इसके विपरीत हरिवंश में यह वर्णन है कि गरुड़ द्वारा पश्चिम दिशा में कुशस्थली को देखा गया जो रैवत की स्थली थी और वहाँ रमणीय रैवतगिरि और मनोहर वन थे। यह पर्वत व समुद्रतट का आशय लेकर अवस्थित थी— देव यास्यामि नगरीं रैवतस्य कुशस्थलीम्। रैवतं च गिरि रम्यं नन्दनप्रतिमं वनम्। रुक्मिणोद्वासितां रम्यां शैलोदधितटाश्रयाम्। (हरिवंश, विष्णुपर्व 55, 7-8) स्कन्दपुराण से पता चलता है कि कुशस्थली का राजा रैवत मूलतः तक्षकनाग था किन्तु वह ब्राह्मणों के श्राप से प्रभास में राज करता था। (स्कन्द. नागर, अध्याय 116)